श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
श्रीरामचरितमानस · पञ्चम सोपान

सुन्दरकाण्ड — सम्पूर्ण मूल पाठ

यहाँ श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड का सम्पूर्ण मूल पाठ दिया गया है — पाठारम्भ हेतु किष्किन्धाकाण्ड के दोहा 29–30 सहित, मंगलाचरण के श्लोक एवं समस्त 60 दोहों तक। प्रत्येक चौपाई एवं दोहे के नीचे उसका सरल भावार्थ भी दिया गया है।

मूल पाठ: गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस (सार्वजनिक सम्पदा)। भावार्थ सरल, सुबोध शब्दों में मन्दिर द्वारा प्रस्तुत मौलिक विवरण है — विस्तृत एवं प्रामाणिक अर्थ हेतु प्रामाणिक मुद्रित संस्करण का अवलोकन करें।

दोहा सूची — किसी भी दोहे पर जाएँ:
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड (पाठ एवं भावार्थ)
प्रारम्भ (किष्किन्धाकाण्ड, दोहा २९–३०) — सुन्दरकाण्ड पाठारम्भ हेतु
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥
भावार्थहनुमान जी की वन्दना — जो दुष्ट-रूपी वन के लिये अग्नि के समान हैं, ज्ञान के घनीभूत स्वरूप हैं, तथा जिनके हृदय-भवन में धनुष-बाण धारण किये श्रीराम निवास करते हैं, उन पवनपुत्र को मैं प्रणाम करता हूँ।
किष्किन्धाकाण्ड
(दोहा २९)
बलि बाँधत प्रभु बाढ़ेउ सो तनु बरनि न जाइ।
उभय घरी महँ दीन्हीं सात प्रदच्छिन धाइ॥
भावार्थ(किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 29) प्रभु के उस विराट रूप का वर्णन नहीं किया जा सकता; अत्यन्त अल्प समय में ही दौड़कर सात प्रदक्षिणाएँ पूर्ण कर ली गयीं।
अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा॥
जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सब ही कर नायक॥१॥
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥२॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥३॥
कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा॥
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा॥४॥
भावार्थअंगद कहते हैं कि मैं समुद्र पार तो कर लूँगा, पर लौटते समय शक्ति रहेगी या नहीं, इसमें संशय है; जाम्बवान कहते हैं कि तुम सब समर्थ हो, पर सबके नायक को कैसे भेजा जाये। फिर जाम्बवान हनुमान जी से कहते हैं — हे बलवान, चुप क्यों बैठे हो? तुम बल में पवन के समान तथा बुद्धि, विवेक एवं विज्ञान के भण्डार हो; संसार में ऐसा कौन-सा कठिन कार्य है जो तुमसे न हो सके। तुम्हारा अवतार ही श्रीराम के कार्य के लिये हुआ है। यह सुनते ही हनुमान जी स्वर्ण के समान तेजस्वी, पर्वताकार रूप धारण कर बार-बार सिंहनाद करते हुए बोले कि मैं खारे समुद्र को खेल-खेल में लाँघ सकता हूँ।
सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी॥
जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही॥५॥
एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥
तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥६॥
भावार्थहनुमान जी कहते हैं कि मैं सहायकों सहित रावण को मारकर त्रिकूट पर्वत को उखाड़कर यहाँ ले आऊँ। फिर विनम्र होकर पूछते हैं — हे जाम्बवान, मुझे उचित शिक्षा दीजिए। जाम्बवान कहते हैं कि तुम बस इतना करो कि जाकर सीता जी को देखकर उनकी सुधि ले आओ; तत्पश्चात कमलनयन श्रीराम अपने भुजबल से तथा लीला हेतु वानर-सेना के संग स्वयं कार्य करेंगे।
[छन्द]
कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं।
त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं॥
जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई।
रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥
भावार्थ[छन्द] वानर-सेना सहित राक्षसों का संहार कर श्रीराम सीता जी को ले आयेंगे; उनका त्रिलोक-पावन सुयश देवता, मुनि तथा नारद आदि गायेंगे। जो इस यश को सुनते, गाते, कहते एवं समझते हैं वे परमपद पाते हैं — तुलसीदास श्रीराम के चरण-कमलों के भ्रमर बनकर यही गाते हैं।
[दोहा ३० (क)]
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥
भावार्थ(दोहा 30 क) श्रीराम का यश संसार-रूपी रोग की औषधि है; जो नर-नारी इसे सुनते हैं, त्रिशिरा के शत्रु श्रीराम उनके समस्त मनोरथ सिद्ध कर देते हैं।
[सोरठा ३० (ख)]
नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।
सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक॥
भावार्थ(सोरठा 30 ख) जिनका शरीर नीलकमल के समान श्याम है और जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवों से अधिक है, तथा जिनका नाम पापरूपी पक्षियों का वधिक (बहेलिया) है — उन्हीं श्रीराम के गुण-समूह सुनने योग्य हैं।
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान — सुन्दरकाण्ड
[श्लोक]
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्॥१॥
भावार्थ[श्लोक] जो शान्त, सनातन, प्रमाणों से परे, निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देनेवाले, ब्रह्मा-शंकर एवं शेष द्वारा निरन्तर सेव्य, वेदान्त द्वारा जानने योग्य, व्यापक, 'राम' नामवाले जगदीश्वर, देवताओं के गुरु, माया से मनुष्य रूप धारण किये हरि, करुणा की खान श्रीरघुवर एवं राजाओं के शिरोमणि हैं — उन्हें मैं वन्दना करता हूँ।
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥२॥
भावार्थ[श्लोक] हे रघुनाथ! मैं सत्य कहता हूँ और आप तो सबके अन्तरात्मा हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदय में कोई और इच्छा नहीं है; हे रघुश्रेष्ठ! मुझे अपनी परिपूर्ण भक्ति दीजिए और मेरे मन को काम आदि दोषों से रहित कर दीजिए।
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥३॥
भावार्थ[श्लोक] अतुलनीय बल के धाम, सुमेरु पर्वत के समान कान्तिमान शरीरवाले, दैत्यरूपी वन के लिये अग्नि, ज्ञानियों में अग्रगण्य, समस्त गुणों के निधान, वानरों के स्वामी तथा श्रीराम के प्रिय भक्त — उन पवनपुत्र हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ।
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥१॥
भावार्थजाम्बवान के सुन्दर वचन हनुमान जी के हृदय को अत्यन्त भाये। वे बोले — हे भाई! जब तक मैं सीता जी को देखकर लौट न आऊँ, तब तक तुम लोग दुःख सहकर, कन्द-मूल-फल खाकर मेरी प्रतीक्षा करना।
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥२॥
भावार्थहनुमान जी कहते हैं कि सीता जी को देखकर ही लौटूँगा और यह कार्य अवश्य होगा, क्योंकि मुझे विशेष हर्ष हो रहा है (जो शुभ शकुन है)। यह कहकर सबको मस्तक नवाकर तथा हृदय में श्रीरघुनाथ को धारण कर वे हर्षपूर्वक चल पड़े।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥३॥
भावार्थसमुद्र के तीर पर एक सुन्दर पर्वत था; हनुमान जी खेल से ही उस पर कूदकर जा चढ़े। बार-बार श्रीरघुवीर का स्मरण कर, अपने भारी बल से पवनपुत्र ने छलाँग लगायी।
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥४॥
भावार्थजिस पर्वत पर पैर रखकर हनुमान जी उछले, वह तुरन्त पाताल में धँस गया। जैसे श्रीरघुनाथ का अमोघ बाण चलता है, उसी वेग से हनुमान जी चल पड़े।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥५॥
भावार्थसमुद्र ने उन्हें श्रीरघुनाथ का दूत जानकर मैनाक पर्वत से कहा कि हे मैनाक! तू (ऊपर उठकर) इनकी थकावट दूर करनेवाला हो।
[दोहा १]
हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥
भावार्थ(दोहा 1) हनुमान जी ने मैनाक को हाथ से छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा — श्रीराम का कार्य किये बिना मुझे विश्राम कहाँ?
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥१॥
भावार्थदेवताओं ने पवनपुत्र को जाते देखा और उनके विशेष बल-बुद्धि की परीक्षा लेने के लिये सर्पों की माता सुरसा को भेजा; उसने आकर हनुमान जी से यह बात कही (कि आज मैं तुम्हें अपना आहार बनाऊँगी)।
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥२॥
भावार्थसुरसा बोली कि आज देवताओं ने मुझे आहार दिया है। यह सुनकर पवनकुमार ने कहा — मैं श्रीराम का कार्य करके लौट आऊँ और सीता जी की सुधि प्रभु को सुना दूँ,
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥३॥
भावार्थतब हे माता! मैं स्वयं तेरे मुख में आ जाऊँगा — यह मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे। किसी भी उपाय से जब सुरसा ने जाने का मार्ग न दिया, तब हनुमान जी ने कहा — तो फिर मुझे निगल ले।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥४॥
भावार्थसुरसा ने एक योजन मुख फैलाया, तो हनुमान जी ने अपना शरीर दुगुना कर लिया। उसने सोलह योजन मुख किया, तो पवनपुत्र तुरन्त बत्तीस योजन के हो गये।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥५॥
भावार्थज्यों-ज्यों सुरसा मुख बढ़ाती गयी, त्यों-त्यों हनुमान जी उससे दुगुना रूप दिखाते गये। जब उसने सौ योजन का मुख किया, तब पवनपुत्र ने अत्यन्त छोटा रूप धारण कर लिया।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥६॥
भावार्थवे उसके मुख में घुसकर तुरन्त बाहर निकल आये और उसे प्रणाम कर विदा माँगी। सुरसा बोली — देवताओं ने मुझे जिस कार्य हेतु भेजा था (तुम्हारी परीक्षा), वह बुद्धि-बल का रहस्य मैंने पा लिया।
[दोहा २]
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥
भावार्थ(दोहा 2) सुरसा आशीर्वाद देती है — हे बल-बुद्धि के निधान! तुम श्रीराम के सभी कार्य पूर्ण करोगे। यह कहकर वह चली गयी और हनुमान जी हर्षित होकर आगे बढ़े।
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥१॥
भावार्थसमुद्र में एक राक्षसी रहती थी जो माया से आकाश में उड़ते पक्षियों को पकड़ लेती थी। जो जीव-जन्तु आकाश में उड़ते, वह जल में उनकी परछाईं देखकर,
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥२॥
भावार्थउनकी छाया पकड़ लेती थी जिससे वे उड़ न सकते; इस प्रकार वह सदा आकाशचारी जीवों को खाती थी। उसने वही छल हनुमान जी पर भी किया, पर हनुमान जी ने उसका कपट तुरन्त पहचान लिया।
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥३॥
भावार्थपवनपुत्र वीर हनुमान जी उसे मारकर धैर्यपूर्वक समुद्र के पार चले गये। वहाँ जाकर उन्होंने वन की शोभा देखी, जहाँ मधु के लोभ से भौंरे गुंजार कर रहे थे।
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥४॥
भावार्थअनेक वृक्ष सुन्दर फल-फूल से युक्त थे; पक्षी एवं पशुओं के समूह देखकर उनका मन प्रसन्न हुआ। आगे एक विशाल पर्वत देखकर वे भय त्यागकर दौड़कर उस पर चढ़ गये।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥५॥
भावार्थ(शिवजी कहते हैं—) हे उमा! इसमें हनुमान जी की कोई बड़ाई नहीं, यह तो उन प्रभु का प्रताप है जो काल को भी खा जाते हैं। पर्वत पर चढ़कर उन्होंने लंका देखी, जो अत्यन्त दुर्गम एवं विशेष किले-सी थी, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥६॥
भावार्थवह लंका अत्यन्त ऊँची थी और चारों ओर समुद्र से घिरी थी; उसका सोने का परकोटा परम प्रकाशमान था।
[छन्द १]
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥
भावार्थ[छन्द] विचित्र मणियों से जड़ा सोने का परकोटा और घने सुन्दर भवन थे; चौराहे, बाजार, सुन्दर मार्ग एवं गलियाँ अनेक प्रकार से सजी थीं। हाथी, घोड़े, खच्चर, पैदल एवं रथों के समूह गिने नहीं जा सकते; अनेक रूपधारी, अत्यन्त बलवान राक्षसों की सेना का वर्णन नहीं किया जा सकता।
[छन्द २]
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥
भावार्थ[छन्द] वन, बाग, उपवन, बाटिका, तालाब, कुएँ एवं बावलियाँ सुशोभित थीं। नाग, देव एवं गन्धर्वों की कन्याएँ अपने रूप से मुनियों के मन को भी मोहती थीं। कहीं पर्वत के समान विशाल शरीरवाले महाबली मल्ल गरजते तथा अनेक अखाड़ों में भिड़कर एक-दूसरे को ललकारते थे।
[छन्द ३]
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥
भावार्थ[छन्द] विकट शरीरवाले करोड़ों योद्धा यत्नपूर्वक नगर की चारों दिशाओं में रक्षा करते थे; कहीं दुष्ट राक्षस भैंसे, मनुष्य, गाय, गधे एवं बकरे खा रहे थे। तुलसीदास कहते हैं कि इन राक्षसों की कथा इसलिये कुछ कही गयी है (कि यही राक्षस आगे) श्रीराम के बाण-रूपी तीर्थ में शरीर त्यागकर उत्तम गति पायेंगे।
[दोहा ३]
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥
भावार्थ(दोहा 3) नगर के अनेक रखवालों को देखकर हनुमान जी ने मन में विचार किया कि अत्यन्त छोटा रूप धारण कर रात्रि में नगर में प्रवेश करूँ।
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥१॥
भावार्थहनुमान जी ने मच्छर के समान रूप धारण किया और श्रीहरि का स्मरण कर लंका की ओर चले। लंकिनी नामक एक राक्षसी थी; वह बोली — मेरा निरादर कर कहाँ चला जा रहा है?
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥२॥
भावार्थ(वह बोली—) रे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना; जहाँ तक चोर हैं, वे सब मेरा आहार हैं। तब महाकपि ने उसे एक घूँसा मारा, जिससे रक्त वमन करती हुई वह पृथ्वी पर लुढ़क पड़ी।
पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥३॥
भावार्थफिर सँभलकर उठी और भयभीत होकर हाथ जोड़कर विनय करने लगी। (बोली—) जब ब्रह्मा ने रावण को वरदान दिया था, तब चलते समय ब्रह्मा ने मुझे यह चिह्न बता दिया था —
बिकल होसि तैं कपि के मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥४॥
भावार्थकि जब तू वानर के मारे व्याकुल हो, तब समझ लेना कि राक्षसों का संहार निकट है। हे तात! मेरा बड़ा पुण्य है कि मैंने अपने नेत्रों से श्रीराम के दूत के दर्शन किये।
[दोहा ४]
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥
भावार्थ(दोहा 4) हे तात! स्वर्ग एवं मोक्ष के समस्त सुखों को यदि तराजू के एक पलड़े में रखा जाये, तो भी वे सब मिलकर सत्संग के एक क्षण के सुख के बराबर नहीं होते।
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥१॥
भावार्थ(लंकिनी कहती है—) हृदय में कोसलपुर के राजा श्रीराम को धारण कर नगर में प्रवेश कर सब कार्य कीजिए। (जिस पर श्रीराम की कृपा हो उसके लिये) विष अमृत बन जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर-जितना और अग्नि शीतल हो जाती है।
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥२॥
भावार्थजिस पर श्रीराम कृपा करके देखते हैं, उसके लिये सुमेरु पर्वत भी धूल के कण के समान हो जाता है। हनुमान जी ने अत्यन्त छोटा रूप धारण किया और भगवान का स्मरण कर नगर में प्रवेश किया।
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥३॥
भावार्थउन्होंने एक-एक मन्दिर (भवन) की खोज की और जहाँ-तहाँ अगणित योद्धा देखे। फिर रावण के महल में गये, जो अत्यन्त विचित्र था, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
सयन किएँ देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥४॥
भावार्थहनुमान जी ने रावण को सोता हुआ देखा, पर महल में सीता जी नहीं दिखीं। फिर एक सुन्दर भवन दिखा, जहाँ अलग से एक हरि-मन्दिर बना था।
[दोहा ५]
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ॥
भावार्थ(दोहा 5) उस घर की शोभा वर्णन से परे थी, जिस पर श्रीराम के आयुध अंकित थे; वहाँ तुलसी के नये पौधों के समूह देखकर कपिराज हनुमान हर्षित हुए।
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
मन महुँ तरक करैं कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥१॥
भावार्थ(हनुमान जी सोचते हैं—) लंका तो राक्षसों के समूह का निवास है, यहाँ सज्जन का वास कैसे? कपि मन में यह तर्क कर ही रहे थे कि उसी समय विभीषण जाग उठे।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥२॥
भावार्थविभीषण ने 'राम-राम' का स्मरण किया, जिससे हनुमान जी ने हृदय में हर्षित होकर उन्हें सज्जन पहचान लिया। (सोचा—) इनसे हठपूर्वक परिचय करूँगा, क्योंकि साधु से कार्य की हानि नहीं होती।
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥३॥
भावार्थब्राह्मण रूप धारण कर हनुमान जी ने वचन सुनाये (श्रीराम-कथा कही); सुनते ही विभीषण उठकर वहाँ आये। प्रणाम कर कुशल पूछी और बोले — हे विप्र! अपनी कथा समझाकर कहिए।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥४॥
भावार्थक्या आप श्रीहरि के दासों में से कोई हैं, जो मेरे हृदय में इतनी प्रीति हो रही है? अथवा क्या आप दीनों पर अनुराग रखनेवाले स्वयं श्रीराम हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने आये हैं?
[दोहा ६]
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥
भावार्थ(दोहा 6) तब हनुमान जी ने सारी श्रीराम-कथा एवं अपना नाम बताया। सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो उठे और गुण-समूह का स्मरण कर मन आनन्दमग्न हो गया।
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥१॥
भावार्थ(विभीषण कहते हैं—) हे पवनपुत्र! हमारी दशा सुनिए — जैसे दाँतों के बीच बेचारी जीभ रहती है (वैसे ही मैं राक्षसों के बीच रहता हूँ)। हे तात! कभी मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुल के स्वामी श्रीराम कृपा करेंगे।
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥२॥
भावार्थतामस (राक्षस) शरीर के कारण मुझसे कोई साधन नहीं बनता और न ही मन में प्रभु के चरण-कमलों में प्रीति है। हे हनुमान! अब मुझे विश्वास हो गया है (कि प्रभु कृपा करेंगे), क्योंकि हरि की कृपा बिना संत नहीं मिलते।
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥३॥
भावार्थ(विभीषण कहते हैं—) यदि श्रीराम ने कृपा न की होती तो आप मुझे हठपूर्वक दर्शन न देते। हनुमान जी बोले — सुनिए, प्रभु की यही रीति है कि वे सेवक पर सदा प्रीति करते हैं।
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥४॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) भला मैं कौन-सा बड़ा कुलीन हूँ? चंचल वानर हूँ और सब प्रकार से हीन हूँ; प्रातःकाल जो हमारा नाम ले ले उसे उस दिन भोजन तक नहीं मिलता — फिर भी प्रभु ने कृपा की।
[दोहा ७]
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥
भावार्थ(दोहा 7) हनुमान जी कहते हैं — हे मित्र! सुनो, मुझ-जैसे अधम पर भी श्रीरघुवीर ने कृपा की है। गुणों का स्मरण कर उनके नेत्र जल से भर आये।
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥१॥
भावार्थऐसे स्वामी को जानते हुए भी जो भुला देते हैं, वे दुखी क्यों न हों? इस प्रकार श्रीराम के गुण-समूह कहते हुए दोनों को अनिर्वचनीय शान्ति मिली।
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥२॥
भावार्थफिर विभीषण ने वह सब कथा कही कि जनकनन्दिनी सीता जी वहाँ किस प्रकार रह रही हैं। तब हनुमान जी बोले — हे भ्राता! सुनो, मैं जानकी माता के दर्शन करना चाहता हूँ।
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥३॥
भावार्थविभीषण ने सारी युक्ति समझा दी; पवनपुत्र विदा लेकर चले। वही (सूक्ष्म) रूप धारण कर वे फिर वहाँ गये, जहाँ अशोक वन में सीता जी रहती थीं।
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥४॥
भावार्थसीता जी को देखकर उन्होंने मन ही मन प्रणाम किया; सीता जी बैठे-बैठे ही रात्रि के प्रहर बिता रही थीं। उनका शरीर दुर्बल था, सिर पर जटाओं की एक वेणी थी, और वे हृदय में श्रीरघुपति के गुण-समूह का जप कर रही थीं।
[दोहा ८]
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥
भावार्थ(दोहा 8) सीता जी नेत्रों को अपने चरणों पर लगाये, मन को श्रीराम के चरण-कमलों में लीन किये हुए थीं। जानकी जी को इस दीन दशा में देखकर पवनपुत्र परम दुखी हुए।
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥१॥
भावार्थहनुमान जी वृक्ष के पत्तों में छिपकर विचार करने लगे कि हे भाई, अब क्या करूँ? उसी समय रावण अनेक स्त्रियों के साथ खूब सज-धजकर वहाँ आया।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥२॥
भावार्थउस दुष्ट ने साम, दान, भय एवं भेद दिखाकर सीता जी को अनेक प्रकार से समझाया। रावण बोला — हे सुमुखी! हे सयानी! सुनो, मन्दोदरी आदि सब रानियों को
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥३॥
भावार्थमैं तुम्हारी दासी बना दूँगा — यह मेरा प्रण है; बस एक बार मेरी ओर देख लो। तब सीता जी तिनके की ओट कर, परम स्नेही अवधपति श्रीराम का स्मरण करके कहती हैं —
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥४॥
भावार्थहे दशमुख! सुन, क्या कभी जुगनू के प्रकाश से कमलिनी खिलती है? हे जानकी! अपने मन में ऐसा समझ ले — इस दुष्ट को श्रीरघुवीर के बाणों की सुधि नहीं है।
सठ सूनें हरि आनेहि मोही। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥५॥
भावार्थरे मूर्ख! तूने मुझे सूने (एकान्त) में हर लाया; रे अधम, निर्लज्ज! क्या तुझे तनिक भी लज्जा नहीं?
[दोहा ९]
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥
भावार्थ(दोहा 9) अपने को जुगनू के समान और श्रीराम को सूर्य के समान कहा सुनकर, वह कठोर वचन सुन रावण अत्यन्त खिझकर तलवार निकालकर बोला —
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥१॥
भावार्थहे सीता! तूने मेरा अपमान किया है, अब मैं कठोर तलवार से तेरा सिर काट डालूँगा; नहीं तो शीघ्र मेरी बात मान ले, हे सुमुखी! अन्यथा तेरे जीवन की हानि होगी।
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥२॥
भावार्थ(सीता जी कहती हैं—) श्याम कमल की माला-सी सुन्दर तथा हाथी की सूँड़-सी प्रभु की भुजा ही मेरे कण्ठ में शोभेगी, या तेरी यह घोर तलवार — हे मूर्ख! सुन, यही मेरा दृढ़ प्रण है।
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥३॥
भावार्थ(सीता जी तलवार से कहती हैं—) हे चन्द्रहास! श्रीरघुपति के विरह से उत्पन्न मेरे सन्ताप को हर ले; तू शीतल एवं तीक्ष्ण धार बहा रहा है — मेरे इस भारी दुःख को दूर कर दे।
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥४॥
भावार्थयह वचन सुनते ही रावण मारने दौड़ा, तब मयकुमारी मन्दोदरी ने नीति कहकर उसे समझाया। रावण ने सब राक्षसियों को बुलाकर कहा कि जाकर सीता को अनेक प्रकार से भय दिखाओ।
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥५॥
भावार्थयदि एक मास में यह मेरा कहा न माने, तो मैं तलवार निकालकर इसे मार डालूँगा।
[दोहा १०]
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥
भावार्थ(दोहा 10) रावण भवन को चला गया; इधर पिशाचिनियों (राक्षसियों) का समूह अनेक नीच रूप धारण कर सीता जी को भय दिखाने लगा।
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥१॥
भावार्थत्रिजटा नामक एक राक्षसी थी, जो श्रीराम के चरणों में प्रेम रखनेवाली एवं विवेक में निपुण थी। उसने सबको बुलाकर एक स्वप्न सुनाया (और कहा—) सीता जी की सेवा कर अपना कल्याण कर लो।
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥२॥
भावार्थ(त्रिजटा कहती है—) स्वप्न में मैंने देखा कि एक वानर ने लंका जला दी और सारी राक्षस-सेना मार डाली; रावण गधे पर सवार, नंगा, सिर मुँड़ा और बीसों भुजाएँ कटी हुई (दक्षिण दिशा को जा रहा है)।
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥३॥
भावार्थइस प्रकार वह दक्षिण दिशा को जा रहा है, मानो लंका विभीषण को मिल गयी हो। नगर में श्रीरघुवीर की दुहाई फिर गयी; तब प्रभु ने सीता जी को बुला भेजा (यही स्वप्न में देखा)।
यह सपना मैं कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥४॥
भावार्थयह स्वप्न मैं पुकारकर कहती हूँ — चार दिन बीतने पर यह सत्य होगा। उसके वचन सुनकर वे सब (राक्षसियाँ) डर गयीं और जनकनन्दिनी के चरणों पर गिर पड़ीं।
[दोहा ११]
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥
भावार्थ(दोहा 11) तब वे सब जहाँ-तहाँ चली गयीं; इधर सीता जी मन में सोचने लगीं कि एक मास बीतने पर यह नीच राक्षस मुझे मार डालेगा।
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥१॥
भावार्थसीता जी त्रिजटा से हाथ जोड़कर बोलीं — हे माता! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है; कोई शीघ्र उपाय कर कि मैं देह त्याग दूँ, क्योंकि यह असह्य विरह अब सहा नहीं जाता।
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥२॥
भावार्थ(सीता जी कहती हैं—) हे माता! काठ लाकर चिता बना दे और फिर उसमें अग्नि लगा दे; हे सयानी! मेरी प्रीति को सत्य कर दे — कान में शूल-सी चुभनेवाली (रावण की) बात कौन सुने।
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥३॥
भावार्थयह सुनकर त्रिजटा ने चरण पकड़कर समझाया और प्रभु के प्रताप, बल एवं सुयश सुनाये। (बोली—) हे सुकुमारी! सुन, रात में अग्नि नहीं मिलेगी। ऐसा कहकर वह अपने भवन को चली गयी।
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥४॥
भावार्थसीता जी कहती हैं — विधाता प्रतिकूल हो गया; न अग्नि मिलेगी, न यह पीड़ा मिटेगी। आकाश में तो अंगारे (तारे) प्रकट दिख रहे हैं, पर धरती पर एक भी तारा नहीं आता (जिससे चिता जले)।
पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥५॥
भावार्थचन्द्रमा अग्निमय होकर भी आग नहीं बरसाता — मानो मुझे अभागी जानकर। (सीता जी अशोक वृक्ष से कहती हैं—) हे अशोक वृक्ष! मेरी विनती सुन, अपना नाम सत्य कर और मेरा शोक हर ले।
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥६॥
भावार्थ(सीता जी कहती हैं—) तेरे नये कोमल पत्ते अग्नि के समान (जलानेवाले) हैं; अब अग्नि दे दे, विलम्ब न कर। सीता जी को विरह से अत्यन्त व्याकुल देखकर हनुमान जी को वह क्षण कल्प के समान बीता।
[सोरठा १२]
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥
भावार्थ(सोरठा 12) तब हनुमान जी ने हृदय में विचार कर मुद्रिका (नीचे) डाल दी; मानो अशोक ने अंगार दे दिया हो — यह समझकर सीता जी हर्षित होकर उठीं और उसे हाथ में ले लिया।
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥१॥
भावार्थतब उन्होंने वह मनोहर मुद्रिका देखी, जिस पर राम-नाम अंकित एवं अत्यन्त सुन्दर थी। मुद्रिका को पहचानकर वे चकित होकर देखने लगीं; हृदय में हर्ष एवं विषाद दोनों से व्याकुल हो उठीं।
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥२॥
भावार्थ(सीता सोचती हैं—) अजेय श्रीरघुनाथ को कौन जीत सकता है (कि उनकी मुद्रिका छीन ले)? माया से ऐसी मुद्रिका बनायी नहीं जा सकती। सीता जी मन में नाना विचार कर रही थीं, तभी हनुमान जी मधुर वचन बोले।
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥३॥
भावार्थहनुमान जी श्रीरामचन्द्र के गुण वर्णन करने लगे; सुनते ही सीता जी का दुःख भाग गया। वे कान एवं मन लगाकर सुनने लगीं; हनुमान जी ने आदि से सारी कथा सुनायी।
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किन भाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥४॥
भावार्थ(सीता सोचती हैं—) जिसने यह कानों को अमृत-सी सुहावनी कथा कही, वह भाई प्रकट क्यों नहीं होता? तब हनुमान जी निकट चले गये; यह देख सीता जी मुड़कर बैठ गयीं और मन में विस्मय हुआ।
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥५॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) हे माता जानकी! मैं श्रीराम का दूत हूँ; करुणानिधान की सत्य शपथ है। हे माता! यह मुद्रिका मैं ही लाया हूँ; श्रीराम ने आपके लिये पहचान-चिह्न के रूप में दी है।
नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥६॥
भावार्थ(सीता पूछती हैं—) मनुष्य का वानर के साथ संग कैसे हुआ? तब हनुमान जी ने बताया कि जिस प्रकार (श्रीराम से) संगति हुई, वह सारी कथा कह सुनायी।
[दोहा १३]
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥
भावार्थ(दोहा 13) हनुमान जी के प्रेमपूर्ण वचन सुनकर सीता जी के मन में विश्वास उत्पन्न हुआ, और उन्होंने जान लिया कि यह मन, वचन एवं कर्म से कृपासिन्धु श्रीराम का दास है।
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥१॥
भावार्थहरि का भक्त जानकर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो गयी; नेत्र सजल हो उठे और रोमांच बढ़ गया। (सीता बोलीं—) हे तात! विरह-समुद्र में डूबती हुई मेरे लिये तुम जहाज बन गये हो।
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥२॥
भावार्थ(सीता जी कहती हैं—) अब कुशल कहो, मैं बलिहारी जाती हूँ — क्या भाई लक्ष्मण सहित सुख के धाम, खर के शत्रु श्रीराम सकुशल हैं? कोमल हृदय, कृपालु श्रीरघुनाथ ने किस कारण यह निष्ठुरता धारण की?
सहज बानि सेवक सुखदायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥३॥
भावार्थ(सीता कहती हैं—) श्रीराम स्वभाव से ही सेवक को सुख देनेवाले हैं; क्या कभी वे मेरी सुधि लेते हैं? हे तात! क्या कभी उनके श्याम, कोमल अंगों को देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे?
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥४॥
भावार्थ(सीता जी की दशा—) वचन नहीं निकलता, नेत्र जल से भर आते हैं; (कहती हैं—) हाय नाथ! आपने मुझे बिल्कुल भुला दिया। सीता जी को विरह से अत्यन्त व्याकुल देखकर हनुमान जी विनम्र, कोमल वचन बोले।
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥५॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) हे माता! अनुज लक्ष्मण सहित प्रभु सकुशल हैं; वे सुकृपा के धाम आपके दुःख से दुखी हैं। हे माता! मन में कमी न मानिए — श्रीराम का आप पर आपसे भी दुगुना प्रेम है।
[दोहा १४]
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥
भावार्थ(दोहा 14) (हनुमान जी कहते हैं—) हे माता! अब धीरज धरकर श्रीरघुपति का सन्देश सुनिए। ऐसा कहते-कहते हनुमान जी गद्गद हो गये और उनके नेत्र जल से भर आये।
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥१॥
भावार्थ(श्रीराम का सन्देश—) हे सीता! तुम्हारे वियोग में मेरे लिये सब कुछ विपरीत हो गया है — वृक्षों के नये पत्ते मानो अग्नि हैं, रात्रि कालरात्रि-सी और चन्द्रमा सूर्य-सा (तपानेवाला) हो गया है।
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥२॥
भावार्थकमलवन भाले के वन-सा, बादल तपते तेल-सा बरसता प्रतीत होता है; जो हितकारी थे वे ही पीड़ा देते हैं, और शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु साँप की साँस-सी लगती है।
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥३॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) कहने से भी दुःख कुछ कम होता, पर किससे कहूँ — इसे कोई नहीं जानता। हे प्रिये! मेरे और तुम्हारे प्रेम का तत्त्व एकमात्र मेरा मन ही जानता है,
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥४॥
भावार्थऔर वह मन सदा तुम्हारे ही पास रहता है — इतने में ही प्रीति का रस समझ लेना। प्रभु का सन्देश सुनते ही सीता जी प्रेम में मग्न हो गयीं और उन्हें शरीर की सुधि न रही।
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥५॥
भावार्थहनुमान जी कहते हैं — हे माता! हृदय में धीरज धरिए और सेवकों को सुख देनेवाले श्रीराम का स्मरण कीजिए; श्रीरघुपति की प्रभुता को हृदय में लाइए और मेरे वचन सुनकर कायरता त्याग दीजिए।
[दोहा १५]
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥
भावार्थ(दोहा 15) राक्षसों का समूह पतंगे के समान है और श्रीरघुपति के बाण अग्नि के समान; हे माता! हृदय में धीरज धरिए — राक्षसों को जला हुआ ही समझिए।
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई॥
राम बान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की॥१॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) यदि श्रीरघुवीर को सुधि मिल जाती तो वे विलम्ब न करते। हे जानकी! श्रीराम के बाण-रूपी सूर्य के उदय होते ही राक्षसों का अन्धकार-समूह (कहाँ टिकेगा)?
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥२॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) हे माता! मैं अभी आपको ले चलूँ, पर श्रीराम की आज्ञा नहीं है — राम की दुहाई। हे जननी! कुछ दिन धीरज धरिए, वानरों सहित श्रीरघुवीर आयेंगे।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥३॥
भावार्थराक्षसों को मारकर वे आपको ले जायेंगे; तीनों लोकों में नारद आदि यश गायेंगे। (सीता कहती हैं—) हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान हैं, और राक्षस अत्यन्त बलवान योद्धा हैं।
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥४॥
भावार्थ(सीता कहती हैं—) मेरे हृदय में बड़ा सन्देह है। यह सुनकर हनुमान जी ने अपना (विशाल) शरीर प्रकट कर दिखाया — सोने के पर्वत के आकार का, युद्ध में भयंकर, अत्यन्त बलवान।
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥५॥
भावार्थतब सीता जी के मन में भरोसा हुआ; फिर पवनपुत्र ने छोटा रूप धारण कर लिया।
[दोहा १६]
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥
भावार्थ(दोहा 16) (हनुमान जी कहते हैं—) हे माता! वानर में कोई विशाल बल-बुद्धि नहीं है; प्रभु के प्रताप से तो अत्यन्त छोटा साँप भी गरुड़ को खा सकता है।
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥१॥
भावार्थभक्ति, प्रताप, तेज एवं बल से सनी हनुमान जी की वाणी सुनकर सीता जी को मन में सन्तोष हुआ। उन्हें श्रीराम का प्रिय जानकर आशीर्वाद दिया — हे तात! तुम बल एवं शील के निधान बनो।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥२॥
भावार्थ(सीता का आशीर्वाद—) हे पुत्र! तुम अजर, अमर एवं गुणों के निधान बनो; श्रीरघुनाथ तुम पर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा करें' — यह कानों से सुनते ही हनुमान जी अपार प्रेम में मग्न हो गये।
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥३॥
भावार्थबार-बार चरणों में सिर नवाकर हनुमान जी हाथ जोड़कर बोले — हे माता! अब मैं कृतकृत्य हो गया; आपका आशीर्वाद अमोघ (कभी व्यर्थ न होनेवाला) विख्यात है।
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥४॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) हे माता! मुझे अत्यधिक भूख लगी है; सुन्दर फलों के वृक्ष देखकर (खाने की इच्छा है)। (सीता बोलीं—) हे पुत्र! वन की रखवाली बड़े-बड़े महाबली राक्षस करते हैं।
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥५॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) हे माता! मुझे उनका कोई भय नहीं, यदि आप मन में सुख (अनुमति) मानें।
[दोहा १७]
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥
भावार्थ(दोहा 17) हनुमान जी को बुद्धि एवं बल में निपुण देखकर जानकी जी ने कहा — जाओ, हे तात! श्रीरघुपति के चरणों को हृदय में धारण कर मधुर फल खाओ।
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥१॥
भावार्थहनुमान जी सिर नवाकर चले और बाग में घुसे; फल खाये और वृक्ष तोड़ने लगे। वहाँ बहुत-से रक्षक योद्धा थे; कुछ को मारा, कुछ पुकारते हुए (रावण के पास) गये।
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥२॥
भावार्थ(रक्षकों ने कहा—) हे नाथ! एक भारी वानर आया है, जिसने अशोक वाटिका उजाड़ दी; फल खाये, वृक्ष उखाड़े और रक्षकों को मसल-मसलकर पृथ्वी पर पटक दिया।
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥३॥
भावार्थयह सुनकर रावण ने अनेक योद्धा भेजे; उन्हें देखकर हनुमान जी गरजे। सब राक्षसों को कपि ने मार डाला; कुछ अधमरे होकर पुकारते हुए भाग गये।
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥४॥
भावार्थफिर रावण ने अक्षयकुमार को भेजा, जो अपार योद्धाओं को साथ लेकर चला। आते देख हनुमान जी ने वृक्ष पकड़कर ललकारा और उसे मारकर महाध्वनि से गरजे।
[दोहा १८]
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥
भावार्थ(दोहा 18) कुछ को मारा, कुछ को मसला और कुछ को धूल में मिला दिया; कुछ फिर जाकर पुकारे कि हे प्रभु! इस वानर का बल बहुत अधिक है।
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥१॥
भावार्थपुत्र (अक्षयकुमार) का वध सुनकर रावण क्रुद्ध हुआ और बलवान मेघनाद को भेजा (और कहा—) हे पुत्र! इसे मारना मत, बाँध लेना; देखें तो यह वानर कहाँ का है।
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥२॥
भावार्थअतुलनीय योद्धा इन्द्रजित (मेघनाद) चला; भाई की मृत्यु सुनकर उसे क्रोध उपजा। हनुमान जी ने देखा कि भयंकर योद्धा आया है; वे दाँत कटकटाकर गरजे और दौड़े।
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥३॥
भावार्थहनुमान जी ने एक अत्यन्त विशाल वृक्ष उखाड़कर रावण-कुमार (मेघनाद) को रथहीन कर दिया। उसके साथ जो महायोद्धा थे, उन्हें कपि पकड़-पकड़कर अपने अंगों से मसल डालते थे।
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥४॥
भावार्थउन्हें मारकर हनुमान जी मेघनाद से भिड़ गये; दोनों मानो दो गजराज लड़ रहे हों। घूँसा मारकर हनुमान जी वृक्ष पर जा चढ़े, जिससे मेघनाद को एक क्षण मूर्च्छा आ गयी।
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥५॥
भावार्थफिर उठकर उसने बहुत माया रची, पर पवनपुत्र हनुमान जीते नहीं जा सके।
[दोहा १९]
ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥
भावार्थ(दोहा 19) मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र का सन्धान किया; हनुमान जी ने मन में विचार किया कि यदि ब्रह्मबाण को न मानूँ (सम्मान न दूँ) तो उसकी अपार महिमा मिट जायेगी।
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥१॥
भावार्थमेघनाद ने हनुमान जी पर ब्रह्मबाण मारा; (बँधने पर भी) उन्होंने बार-बार सेना का संहार किया। जब उसने कपि को मूर्च्छित-सा देखा, तब नागपाश में बाँधकर ले गया।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥२॥
भावार्थ(शिवजी कहते हैं—) हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर ज्ञानी मनुष्य भव-बन्धन काट डालते हैं, उनका दूत क्या बन्धन में आ सकता है? प्रभु के कार्य हेतु ही हनुमान जी ने अपने को बँधवा लिया।
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥३॥
भावार्थकपि का बँधना सुनकर राक्षस दौड़े और कौतुक देखने सब सभा में आ गये। हनुमान जी ने जाकर रावण की सभा देखी, जिसकी अत्यधिक प्रभुता का वर्णन नहीं किया जा सकता।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥४॥
भावार्थहाथ जोड़े हुए देवता एवं दिक्पाल विनम्र खड़े थे, सब भयभीत होकर रावण की भृकुटि देख रहे थे। उसका प्रताप देखकर भी हनुमान जी के मन में कोई शंका न हुई — जैसे सर्पों के बीच गरुड़ निर्भय रहते हैं।
[दोहा २०]
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥
भावार्थ(दोहा 20) हनुमान जी को देखकर रावण दुर्वचन कहकर हँसा; फिर पुत्र-वध का स्मरण आते ही उसके हृदय में विषाद उपजा।
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥१॥
भावार्थरावण बोला — रे वानर! तू कौन है? किसके बल पर तूने वन उजाड़ डाला? क्या तूने मेरा नाम कानों से नहीं सुना? रे मूर्ख! तुझे अत्यन्त निडर देख रहा हूँ।
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया॥२॥
भावार्थ(रावण कहता है—) किस अपराध से तूने राक्षसों को मारा? रे मूर्ख! कह, क्या तुझे प्राणों का भय नहीं? (हनुमान जी कहते हैं—) हे रावण! सुन, जिनके बल से माया अनेक ब्रह्माण्ड-समूह रचती है,
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥३॥
भावार्थजिनके बल से हे दशमुख! ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव सृष्टि का पालन, सृजन एवं संहार करते हैं, जिनके बल से सहस्रमुख शेष अण्डकोश सहित पर्वत-वनों को सिर पर धारण करते हैं,
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥४॥
भावार्थजो देवताओं की रक्षा हेतु अनेक शरीर धारण करते हैं — वे ही तुम-जैसे मूर्खों को शिक्षा देनेवाले हैं। जिन्होंने शिव का कठोर धनुष तोड़ा और उस (सीता-स्वयंवर) में राजाओं के दल का मद चूर किया,
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥५॥
भावार्थजिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा एवं बालि — इन सब अतुलनीय बलशालियों का वध किया (वे ही श्रीराम हैं)।
[दोहा २१]
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥
भावार्थ(दोहा 21) जिनके बल के लेशमात्र से तूने समस्त चराचर को जीत लिया, उन्हीं का मैं दूत हूँ, जिनकी प्रिय पत्नी को तू हर लाया है।
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥१॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) मैं तुम्हारी प्रभुता जानता हूँ — सहस्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई हुई और बालि से युद्ध कर तुमने (कैसा) यश पाया! कपि के वचन सुनकर रावण हँसकर बात टालने लगा।
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥२॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) हे स्वामी! मुझे भूख लगी थी, अतः फल खाये; और वानर-स्वभाव से वृक्ष तोड़े। सबको अपना शरीर परम प्रिय होता है, अतः कुमार्गगामी राक्षस मुझे मारने लगे।
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥३॥
भावार्थजिन्होंने मुझे मारा, उन्हें मैंने मारा; उस पर तुम्हारे पुत्र ने मुझे बाँध लिया। मुझे बँधने की कुछ लज्जा नहीं, क्योंकि मैं अपने प्रभु का कार्य करना चाहता हूँ।
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥४॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) हे रावण! हाथ जोड़कर विनती करता हूँ, अभिमान त्यागकर मेरी सीख सुनो; अपने कुल पर विचार कर, भ्रम त्यागकर भक्तों के भय हरनेवाले श्रीराम का भजन करो।
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥५॥
भावार्थजिसके डर से काल भी डरता है और जो देव-असुर एवं चराचर को खा जाता है, उससे कभी बैर न करो; मेरा कहा मानकर जानकी जी लौटा दो।
[दोहा २२]
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥
भावार्थ(दोहा 22) शरणागत के रक्षक, खर के शत्रु, करुणासागर श्रीरघुनाथ शरण में जाने पर तुम्हारे अपराध भुलाकर तुम्हारी रक्षा करेंगे।
राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥१॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) श्रीराम के चरण-कमलों को हृदय में धारण करो और लंका का अचल राज्य करो। पुलस्त्य ऋषि का यश निर्मल चन्द्रमा-सा है; उस चन्द्रमा में कलंक न बनो।
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी॥२॥
भावार्थराम-नाम बिना वाणी शोभा नहीं देती — मद-मोह त्यागकर विचार कर देखो। हे रावण! जैसे वस्त्रहीन स्त्री सब आभूषणों से सजी होने पर भी शोभा नहीं पाती (वैसे ही राम-नाम बिना सब व्यर्थ है)।
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥३॥
भावार्थश्रीराम से विमुख की सम्पत्ति एवं प्रभुता पाकर भी न पाये के समान है (नष्टप्राय रहती है); जैसे जिन नदियों का मूल (स्रोत) जलयुक्त नहीं होता, वे वर्षा बीतते ही सूख जाती हैं।
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥४॥
भावार्थहे दशकण्ठ! सुन, मैं प्रण करके कहता हूँ — श्रीराम से विमुख को कोई भी बचानेवाला नहीं। हजारों शंकर, विष्णु एवं ब्रह्मा भी राम के द्रोही को नहीं बचा सकते।
[दोहा २३]
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥
भावार्थ(दोहा 23) मोह जिसका मूल है और जो अनेक पीड़ाएँ देता है, ऐसे अन्धकाररूपी अभिमान को त्याग दो; कृपासागर भगवान श्रीरघुनाथ राम का भजन करो।
जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥१॥
भावार्थयद्यपि हनुमान जी ने भक्ति, विवेक, वैराग्य एवं नीति से सनी अत्यन्त हितकारी वाणी कही, तथापि वह महा अभिमानी रावण हँसकर बोला — हमें यह वानर बड़ा ज्ञानी गुरु मिला!
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥२॥
भावार्थ(रावण कहता है—) रे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गयी है, तभी तू मुझे शिक्षा देने लगा। हनुमान जी ने कहा — उलटा होगा (मृत्यु तेरी निकट है); मैंने तेरा बुद्धि-भ्रम प्रत्यक्ष जान लिया।
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥३॥
भावार्थकपि के वचन सुनकर रावण बहुत खिझा (और बोला—) रे मूर्खो! इसके प्राण शीघ्र क्यों नहीं हरते? यह सुनते ही राक्षस मारने दौड़े; तभी मन्त्रियों सहित विभीषण आ गये।
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
आन दंड कछु करिअ गोसाईं। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥४॥
भावार्थसिर नवाकर बहुत विनय की — नीति के विरुद्ध दूत का वध नहीं करना चाहिए; हे स्वामी! कोई और दण्ड दीजिए। सबने कहा — भाई, यह सलाह अच्छी है।
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर॥५॥
भावार्थयह सुनकर रावण हँसकर बोला — वानर के अंग-भंग करके भेज दो।
[दोहा २४]
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥
भावार्थ(दोहा 24) (रावण कहता है—) वानर को अपनी पूँछ पर बड़ी ममता होती है — यह मैं सबको समझाकर कहता हूँ; अतः इसकी पूँछ में तेल में डुबोकर वस्त्र बाँधकर फिर आग लगा दो।
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई। देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥१॥
भावार्थ(रावण कहता है—) बिना पूँछ का वानर वहाँ जायेगा, तब मूर्ख अपने स्वामी को ले आयेगा; जिनकी इसने बहुत बड़ाई की, उनकी प्रभुता मैं भी देखूँगा।
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥२॥
भावार्थयह वचन सुनते ही कपि मन में मुस्कुराये (सोचा—) सरस्वती सहायक हुईं, यह मैं जान गया। राक्षस रावण के वचन सुनकर वही (पूँछ जलाने की) तैयारी करने लगे।
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥३॥
भावार्थनगर में वस्त्र, घी एवं तेल नहीं बचा (इतनी पूँछ बढ़ी); हनुमान जी ने पूँछ बहुत बढ़ाकर यह खेल रचा। कौतुक देखने नगरवासी आये, कपि को चरणों से मारते और खूब हँसी करते।
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघुरूप तुरंता॥४॥
भावार्थढोल बजाते और सब तालियाँ देते हुए नगर घुमाकर फिर पूँछ जला दी। अग्नि जलती देख हनुमान जी तुरन्त अत्यन्त छोटे रूप के हो गये।
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं॥५॥
भावार्थकपि (बन्धन से) निकलकर सोने की अटारियों पर जा चढ़े; राक्षसों की स्त्रियाँ भयभीत हो गयीं।
[दोहा २५]
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥
भावार्थ(दोहा 25) उसी अवसर पर श्रीहरि की प्रेरणा से उनचास पवन चलने लगे; अट्टहास कर हनुमान जी गरजे और बढ़कर आकाश तक जा लगे।
देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥१॥
भावार्थविशाल शरीर होने पर भी वे परम हल्के थे; एक भवन से दूसरे भवन पर दौड़कर चढ़ जाते। नगर जलने लगा और लोग बेहाल हो गये; करोड़ों भयंकर लपटें झपट रही थीं।
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहिं अवसर को हमहि उबारा॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई॥२॥
भावार्थ'हा तात! हा मात!' — ऐसी पुकार सुनायी देने लगी कि इस समय हमें कौन बचाये। (लोग कहते—) हमने तो कहा था कि यह वानर नहीं, वानर रूप में कोई देवता है।
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाही॥३॥
भावार्थसाधु के अपमान का यही फल है कि नगर अनाथ के नगर-सा जल रहा है। एक क्षण में ही नगर जला दिया; केवल एक विभीषण का घर न जला।
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥४॥
भावार्थ(शिवजी कहते हैं—) हे गिरिजा! जिन्होंने अग्नि को उत्पन्न किया, उन्हीं का दूत (हनुमान) उस कारण से नहीं जला। लंका को उलट-पुलटकर सब जला दिया, फिर समुद्र में कूद पड़े।
[दोहा २६]
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥
भावार्थ(दोहा 26) पूँछ बुझाकर एवं थकान मिटाकर, फिर छोटा रूप धारण कर हनुमान जी जनकनन्दिनी सीता जी के आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये।
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥१॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) हे माता! मुझे कोई पहचान-चिह्न दीजिए, जैसा श्रीरघुनाथ ने मुझे दिया था। तब सीता जी ने चूड़ामणि उतारकर दे दी; हनुमान जी ने हर्षपूर्वक उसे ले लिया।
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥२॥
भावार्थ(सीता जी कहती हैं—) हे तात! (श्रीराम से) कहना — मेरा प्रणाम; प्रभु सब प्रकार से पूर्णकाम हैं। हे नाथ! दीनों पर दया का अपना विरद स्मरण कर मेरा भारी संकट हर लीजिए।
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥३॥
भावार्थ(सीता जी कहती हैं—) हे तात! इन्द्रपुत्र जयन्त (एवं काकभुशुण्डि) का प्रसंग सुनाना और प्रभु को बाण के प्रताप का स्मरण कराना। यदि एक मास में नाथ न आये, तो फिर वे मुझे जीवित नहीं पायेंगे।
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥४॥
भावार्थ(सीता जी कहती हैं—) हे कपि! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ? तुम भी, हे तात, अब जाने की कहते हो। तुम्हें देखकर छाती शीतल हुई थी; फिर मुझे वही दिन, वही रात (कष्टमय) रहेगी।
[दोहा २७]
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥
भावार्थ(दोहा 27) जनकनन्दिनी को अनेक प्रकार से समझाकर धीरज देकर, चरण-कमलों में सिर नवाकर हनुमान जी ने श्रीराम की ओर प्रस्थान किया।
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥१॥
भावार्थचलते समय हनुमान जी ने भारी महाध्वनि से गर्जना की, जिसे सुनकर राक्षसों की स्त्रियों के गर्भ गिर जाते। समुद्र लाँघकर वे इस पार आये और वानरों को किलकिला (हर्ष) शब्द सुनाया।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥२॥
भावार्थहनुमान जी को देखकर सब हर्षित हुए; वानरों ने तब मानो नया जन्म पाया। हनुमान जी का मुख प्रसन्न था और शरीर तेज से सुशोभित था — उन्होंने श्रीरामचन्द्र का कार्य पूर्ण कर लिया था।
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥३॥
भावार्थसब वानर हनुमान जी से मिलकर अत्यन्त सुखी हुए, जैसे तड़पती मछली को जल मिल जाये। फिर सब हर्षपूर्वक श्रीरघुनाथ के पास चले, नया वृत्तान्त पूछते-कहते हुए।
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥४॥
भावार्थतब सब मधुवन के भीतर आये और अंगद की सम्मति से मधु एवं फल खाये। जब रखवाले रोकने लगे, तब घूँसों के प्रहार से (मार खाकर) सब भाग गये।
[दोहा २८]
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥
भावार्थ(दोहा 28) वे सब जाकर युवराज (अंगद) द्वारा वन उजाड़ने की पुकार करने लगे; यह सुनकर सुग्रीव हर्षित हुए (और समझ गये) कि वानरों ने प्रभु का कार्य कर दिया।
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा॥१॥
भावार्थ(सुग्रीव सोचते हैं—) यदि सीता जी की सुधि न मिली होती तो क्या ये मधुवन के फल खा सकते? राजा सुग्रीव मन में यह विचार कर ही रहे थे कि समाज सहित वानर आ पहुँचे।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥२॥
भावार्थसबने आकर चरणों में सिर नवाया; कपिराज सुग्रीव सबसे अत्यन्त प्रेम से मिले। कुशल पूछी; चरणों (पैरों की स्थिति एवं मुख) को देखकर जाना कि श्रीराम की कृपा से विशेष कार्य सिद्ध हुआ है।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥३॥
भावार्थ(वानरों ने कहा—) हे नाथ! हनुमान जी ने कार्य कर दिखाया और सब वानरों के प्राण बचा लिये। यह सुनकर सुग्रीव फिर हनुमान जी से मिले और वानरों सहित श्रीरघुपति के पास चले।
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥४॥
भावार्थश्रीराम ने जब वानरों को (कार्य पूर्ण कर) आते देखा, तो उनके मन में विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिला पर बैठे थे; सब वानर जाकर उनके चरणों पर गिर पड़े।
[दोहा २९]
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥
भावार्थ(दोहा 29) करुणा के पुंज श्रीरघुपति सबसे प्रेमपूर्वक मिले और कुशल पूछी — हे नाथ! आपके चरण-कमलों के दर्शन से अब कुशल है।
जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥१॥
भावार्थजाम्बवान कहते हैं — हे रघुनाथ! सुनिए, जिस पर आप दया करते हैं, उसका सदा निरन्तर कल्याण एवं कुशल होता है; देव, मनुष्य एवं मुनि उस पर प्रसन्न रहते हैं।
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रैलोक उजागर॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू॥२॥
भावार्थवही विजयी, विनयी एवं गुणों का सागर होता है; उसका सुयश तीनों लोकों में उजागर होता है। प्रभु की कृपा से सारा कार्य सिद्ध हुआ; आज हमारा जन्म सफल हो गया।
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥३॥
भावार्थहे नाथ! पवनपुत्र ने जो करनी की, वह हजारों मुखों से भी वर्णित नहीं हो सकती। जाम्बवान ने पवनपुत्र के सुन्दर चरित्र श्रीरघुपति को सुनाये।
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥४॥
भावार्थसुनकर कृपानिधान श्रीराम के मन को अत्यन्त भाये; फिर उन्होंने हनुमान जी को हर्षपूर्वक हृदय से लगा लिया (और पूछा—) हे तात! कहो, जानकी किस प्रकार अपने प्राणों की रक्षा करती हुई रह रही हैं?
[दोहा ३०]
नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥
भावार्थ(दोहा 30) (हनुमान जी कहते हैं—) आपका नाम पहरेदार है, दिन-रात आपका ध्यान (सीता जी के लिये) किवाड़ है, और नेत्र अपने चरणों में जड़े (लगे) हैं — फिर प्राण किस मार्ग से निकलें?
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥१॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) चलते समय सीता जी ने मुझे चूड़ामणि दी। श्रीरघुपति ने उसे हृदय से लगा लिया। हे नाथ! दोनों नेत्रों में जल भरकर जनककुमारी ने कुछ वचन कहे।
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥२॥
भावार्थ(सीता जी के वचन—) हे प्रभु! अनुज लक्ष्मण सहित चरण पकड़ना; हे दीनबन्धु! हे शरणागत की पीड़ा हरनेवाले! मैं मन, वचन एवं कर्म से आपके चरणों की अनुरागिनी हूँ — फिर हे नाथ! किस अपराध से मुझे त्याग दिया?
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥३॥
भावार्थ(सीता जी कहती हैं—) अपना एक अवगुण मैं मानती हूँ कि (आपसे) बिछुड़ते ही मेरे प्राण नहीं निकल गये। हे नाथ! यह नेत्रों का अपराध है, जो प्राण निकलते समय हठपूर्वक बाधा डालते हैं।
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥४॥
भावार्थविरह अग्नि है, शरीर रुई और श्वास वायु है — क्षणभर में शरीर जल जाना चाहिए; पर नेत्र अपने हित के लिये जल बहाते रहते हैं, जिससे देह विरहाग्नि में जल नहीं पाती।
सीता कै अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥५॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) सीता जी की विपत्ति अत्यन्त विशाल है; हे दीनदयाल! बिना कहे ही (समझ लेना) अच्छा है (कही नहीं जा सकती)।
[दोहा ३१]
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥
भावार्थ(दोहा 31) हे करुणानिधान! सीता जी का एक-एक क्षण कल्प के समान बीतता है; अतः हे प्रभु! शीघ्र चलिए और भुजबल से दुष्ट-दल को जीतकर उन्हें ले आइए।
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥
बचन कायँ मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥१॥
भावार्थसीता जी का दुःख सुनकर सुख के धाम प्रभु श्रीराम के कमल-नेत्रों में जल भर आया। (श्रीराम कहते हैं—) वचन, काया एवं मन से मेरी जो गति (शरणागत) है, उसे स्वप्न में भी क्या विपत्ति छू सकती है?
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥२॥
भावार्थहनुमान जी कहते हैं — हे प्रभु! विपत्ति तो वही है, जब आपका स्मरण-भजन न हो। हे प्रभु! राक्षसों की कितनी-सी बात है — शत्रु को जीतकर जानकी जी को ले आइएगा।
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥३॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) हे कपि! सुन, तुम्हारे समान उपकारी कोई देव, मनुष्य या मुनि शरीरधारी नहीं है; मैं तुम्हारा क्या प्रत्युपकार करूँ — मेरा मन (उऋण होने में) सम्मुख भी नहीं हो पाता।
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥४॥
भावार्थहे पुत्र! सुन, मैंने मन में विचार कर देखा — मैं तुमसे उऋण नहीं हूँ (हो सकता)। देवताओं के रक्षक श्रीराम बार-बार कपि को देखते हैं; उनके नेत्रों में जल एवं शरीर अत्यन्त पुलकित है।
[दोहा ३२]
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥
भावार्थ(दोहा 32) प्रभु के वचन सुनकर एवं उनका मुख व शरीर देखकर हनुमान जी हर्षित हुए, और प्रेम में विह्वल होकर चरणों में गिर पड़े — 'त्राहि-त्राहि, हे भगवन्!'
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥१॥
भावार्थप्रभु बार-बार उन्हें उठाना चाहते हैं, पर प्रेम में मग्न हनुमान जी को उठना नहीं भाता। कपि के सिर पर प्रभु का कर-कमल है — उस दशा का स्मरण कर शिवजी (भी प्रेम में) मग्न हो गये।
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥२॥
भावार्थफिर मन को सावधान कर शंकर जी अत्यन्त सुन्दर कथा कहने लगे। प्रभु ने कपि को उठाकर हृदय से लगाया और हाथ पकड़कर परम निकट बैठा लिया।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥३॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) हे कपि! कहो, रावण द्वारा रक्षित लंका के अत्यन्त सुदृढ़ दुर्ग को तुमने किस प्रकार जलाया? हनुमान जी ने प्रभु को प्रसन्न जाना और अभिमानरहित वचन बोले।
साखामृग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥४॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) वानर की बड़ी चतुराई तो बस इतनी है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर जा सके; समुद्र लाँघना, स्वर्णनगरी जलाना, राक्षसों का वध एवं वन उजाड़ना —
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥५॥
भावार्थवह सब आपका ही प्रताप है, हे रघुनाथ! उसमें मेरी कोई प्रभुता नहीं।
[दोहा ३३]
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।
तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥
भावार्थ(दोहा 33) आप जिस पर अनुकूल हों, उसके लिये कुछ भी अगम्य (कठिन) नहीं; आपके प्रभाव से तो रुई भी बड़वानल (समुद्र की अग्नि) को जला सकती है।
नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥१॥
भावार्थ(हनुमान जी कहते हैं—) हे नाथ! मुझे अपनी अत्यन्त सुखदायिनी, अविनाशिनी भक्ति कृपा करके दीजिए। कपि की परम सरल वाणी सुनकर प्रभु ने 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा।
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥२॥
भावार्थ(शिवजी कहते हैं—) हे उमा! जिसने श्रीराम का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर और कुछ अच्छा नहीं लगता। यह संवाद जिसके हृदय में आ जाता है, वही श्रीरघुपति के चरणों की भक्ति पा लेता है।
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥३॥
भावार्थप्रभु के वचन सुनकर वानर-समूह कहने लगे — जय-जय-जय, हे कृपालु सुख के कन्द! तब श्रीरघुपति ने वानरराज सुग्रीव को बुलाया और चलने की तैयारी करने को कहा।
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥४॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) अब किस कारण विलम्ब किया जाये? वानरों को तुरन्त आज्ञा दो। यह कौतुक देखकर देवता आकाश से बहुत फूल बरसाकर हर्षित होकर अपने-अपने लोक को चले।
[दोहा ३४]
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥
भावार्थ(दोहा 34) वानरराज सुग्रीव ने शीघ्र बुलाया, तो सेनापतियों के झुंड आ गये — नाना रंगों के, अतुलनीय बलवाले वानर-भालुओं के समूह।
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥१॥
भावार्थसब प्रभु के चरण-कमलों में सिर नवाते तथा महाबली भालू-वानर गरजते थे। श्रीराम ने सारी वानर-सेना देखी और कमल-नेत्रों से कृपापूर्वक निहारा।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥२॥
भावार्थश्रीराम की कृपा का बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंखयुक्त पर्वत हो गये। तब श्रीराम ने हर्षित होकर प्रस्थान किया; अनेक सुन्दर शुभ शकुन हुए।
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥३॥
भावार्थजिनकी कीर्ति सर्वमंगलमयी है, उनके प्रस्थान में शकुन होना यही नीति है (शोभा देती है)। प्रभु का प्रस्थान सीता जी ने भी जाना — मानो उनका बायाँ अंग फड़ककर कह रहा हो।
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई॥
चला कटकु को बरनै पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥४॥
भावार्थजो-जो शकुन जानकी जी के लिये (शुभ) होते, वही रावण के लिये अशुभ होते। सेना चली, जिसका वर्णन कौन कर सकता है; अपार वानर-भालू गरज रहे थे।
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥५॥
भावार्थनख जिनके आयुध हैं, पर्वत एवं वृक्ष धारण किये, इच्छानुसार चलनेवाले वे आकाश एवं पृथ्वी पर चले। भालू-वानर सिंहनाद करते थे, जिससे दिग्गज डगमगाते और चिंघाड़ते थे।
[छन्द १]
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥
भावार्थ[छन्द] दिग्गज चिंघाड़ते, पृथ्वी डोलती, पर्वत हिलते एवं समुद्र खलबला उठे। गन्धर्व, देव, मुनि, नाग एवं किन्नर मन में हर्षित हुए और उनके दुःख टल गये। विकट योद्धा वानर दाँत कटकटाते, करोड़ों-करोड़ों दौड़ते और 'जय राम, प्रबल प्रताप कोसलनाथ' के गुण-समूह गाते थे।
[छन्द २]
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥
भावार्थ[छन्द] उदार शेषनाग उस भार को सह नहीं पाते, बार-बार व्याकुल होते और बार-बार कच्छप की कठोर पीठ को दाँतों से पकड़ते — वह कैसे शोभा दे रहा है! मानो श्रीरघुवीर के सुन्दर प्रस्थान की परम सुहावनी अविचल पावन गाथा शेषजी कच्छप की पीठ पर लिख रहे हों।
[दोहा ३५]
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥
भावार्थ(दोहा 35) इस प्रकार कृपानिधान श्रीराम जाकर समुद्र-तट पर उतरे; वहाँ बहुत-से भालू एवं वीर वानर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे।
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब तें जारि गयउ कपि लंका॥
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥१॥
भावार्थउधर जब से कपि लंका जलाकर गया, राक्षस शंकित रहने लगे। सब अपने-अपने घरों में विचार करते कि राक्षस-कुल का बचाव नहीं है।
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥२॥
भावार्थ(राक्षस कहते—) जिसके दूत का बल वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके (स्वयं) आने पर क्या भलाई? दूतियों से नगरवासियों की यह बात सुनकर मन्दोदरी अत्यन्त व्याकुल हुई।
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥३॥
भावार्थएकान्त में हाथ जोड़कर पति के चरणों में लगकर वह नीति-रस में पगी वाणी बोली — हे कान्त! श्रीहरि (राम) से विरोध छोड़ दीजिए; मेरा अत्यन्त हितकारी कहा हृदय में धारण कीजिए।
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥४॥
भावार्थ(मन्दोदरी कहती है—) जिसके दूत की करनी को याद कर राक्षसों की स्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं, हे कान्त! यदि भलाई चाहते हैं तो अपने मन्त्री को बुलाकर उसकी (श्रीराम की) पत्नी (सीता) लौटा दीजिए।
तव कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥५॥
भावार्थ(मन्दोदरी कहती है—) आपके कुल-रूपी कमल-वन के लिये सीता शीत-रात्रि के समान दुखदायी होकर आयी है। हे नाथ! सुनिए, सीता को लौटाये बिना शम्भु एवं ब्रह्मा भी आपका भला नहीं कर सकते।
[दोहा ३६]
राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥
भावार्थ(दोहा 36) श्रीराम के बाण सर्प-समूह के समान हैं और राक्षसों का समूह मेंढकों के समान; जब तक वे (बाण) ग्रस न लें, तब तक हठ त्यागकर उपाय (सीता लौटाना) कर लीजिए।
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥१॥
भावार्थउस (मन्दोदरी) की वाणी कानों से सुनकर जगत्प्रसिद्ध अभिमानी रावण खूब हँसा। (सोचा—) स्त्री का स्वभाव भयभीत रहना ही सच्चा है; मंगल में भी उसका मन भय से अत्यन्त कच्चा (डरपोक) रहता है।
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥२॥
भावार्थ(रावण सोचता है—) यदि वानर-सेना आ भी जाये, तो बेचारे राक्षस उन्हें खाकर जीवित रहेंगे। जिसके भय से लोकपाल काँपते हैं, उसकी स्त्री का भयभीत होना बड़ी हँसी की बात है।
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥३॥
भावार्थऐसा कहकर हँसकर रावण ने उसे हृदय से लगाया और ममता बढ़ाकर सभा को चला। मन्दोदरी हृदय में चिन्ता करने लगी कि पति पर विधाता विपरीत हो गया है।
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥४॥
भावार्थसभा में बैठते ही रावण को यह खबर मिली कि समुद्र पार सारी सेना आ गयी है। उसने मन्त्रियों से उचित सलाह पूछी, पर वे सब हँसकर (चापलूसी में बोले—) चुप रहिए (चिन्ता की बात नहीं)।
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माहीं॥५॥
भावार्थ(मन्त्री कहते हैं—) जब आपने देव-असुरों को जीता तब तो श्रम नहीं हुआ; फिर मनुष्य एवं वानर किस गिनती में हैं?
[दोहा ३७]
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥
भावार्थ(दोहा 37) मन्त्री, वैद्य एवं गुरु — ये तीनों यदि भय या लालच से प्रिय (चापलूसी की) बात कहें, तो क्रमशः राज्य, धर्म एवं शरीर — तीनों का शीघ्र ही नाश हो जाता है।
सोइ रावन कहुँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥१॥
भावार्थरावण के लिये वही (चापलूसी) सहायक बनी; मन्त्री सुना-सुनाकर स्तुति करने लगे। अवसर जानकर विभीषण आये और भाई के चरणों में सिर नवाया।
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥२॥
भावार्थफिर सिर नवाकर अपने आसन पर बैठे और आज्ञा पाकर वचन बोले — हे कृपालु! जो आपने मुझसे बात पूछी है, तो हे तात! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार हित की बात कहता हूँ।
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥३॥
भावार्थ(विभीषण कहते हैं—) जो अपना कल्याण, सुयश, सुबुद्धि, शुभ गति एवं नाना सुख चाहता हो, हे स्वामी! वह पराई स्त्री का ललाट (माथा तक देखना) चौथ के चन्द्रमा की भाँति त्याग दे।
चौदह भुवन एक पति होई। भूत द्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥४॥
भावार्थचौदह भुवनों का एक ही स्वामी क्यों न हो, यदि वह प्राणियों से द्रोह करता है तो टिक नहीं सकता। जो गुणों का सागर एवं चतुर मनुष्य हो, उसे भी थोड़े-से लोभ के कारण कोई भला नहीं कहता।
[दोहा ३८]
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥
भावार्थ(दोहा 38) हे नाथ! काम, क्रोध, मद एवं लोभ — ये सब नरक के मार्ग हैं; इन सबको त्यागकर श्रीरघुवीर का भजन कीजिए, जिन्हें संत भजते हैं।
तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥१॥
भावार्थ(विभीषण कहते हैं—) हे तात! श्रीराम कोई मनुष्य-राजा नहीं, अपितु समस्त लोकों के स्वामी एवं काल के भी काल हैं। वे निर्विकार, अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि एवं अनन्त भगवान हैं।
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपा सिंधु मानुष तनुधारी॥
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥२॥
भावार्थवे गौ, ब्राह्मण एवं देवताओं के हितकारी, करुणासागर हैं, जिन्होंने मनुष्य शरीर धारण किया है। हे भाई! सुनो — वे भक्तों को आनन्द देनेवाले, दुष्ट-समूह के नाशक तथा वेद एवं धर्म के रक्षक हैं।
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥३॥
भावार्थउनसे बैर त्यागकर मस्तक नवाना चाहिए, जो शरणागत की पीड़ा हरनेवाले रघुनाथ हैं। हे नाथ! प्रभु को सीता जी लौटा दीजिए और बिना किसी स्वार्थ के स्नेह करनेवाले श्रीराम का भजन कीजिए।
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥४॥
भावार्थशरण में जाने पर प्रभु उसे भी नहीं त्यागते जिसे विश्व-द्रोह का पाप लगा हो। जिनका नाम तीनों तापों का नाश करनेवाला है, हे रावण! हृदय में समझ लो कि वही प्रभु (श्रीराम) प्रकट हुए हैं।
[दोहा ३९ (क)]
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥
भावार्थ(दोहा 39 क) हे दशशीश! मैं बार-बार आपके चरणों में पड़ता हूँ और विनय करता हूँ — मान, मोह एवं मद त्यागकर कोसलाधीश श्रीराम का भजन कीजिए।
[दोहा ३९ (ख)]
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥
भावार्थ(दोहा 39 ख) यह बात मुनि पुलस्त्य ने अपने शिष्य के द्वारा कहला भेजी थी; हे तात! सुअवसर पाकर वही मैंने तुरन्त आपसे कह दी।
माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥१॥
भावार्थमाल्यवान नामक अत्यन्त बुद्धिमान मन्त्री ने उसके (विभीषण के) वचन सुनकर बहुत सुख माना (और बोला—) हे तात! तुम्हारा छोटा भाई नीति का भूषण है; विभीषण जो कहता है उसे हृदय में धारण करो।
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ॥
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥२॥
भावार्थ(रावण कहता है—) ये दोनों मूर्ख शत्रु की बड़ाई कर रहे हैं; यहाँ कोई है (जो इन्हें दूर करे)? माल्यवान तो लौटकर घर चला गया, पर विभीषण फिर हाथ जोड़कर कहने लगे —
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥३॥
भावार्थहे नाथ! सुबुद्धि एवं कुबुद्धि — दोनों सबके हृदय में रहती हैं, पुराण एवं वेद ऐसा कहते हैं। जहाँ सुबुद्धि है वहाँ नाना प्रकार की सम्पत्ति, और जहाँ कुबुद्धि है वहाँ अन्ततः विपत्ति रहती है।
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥४॥
भावार्थ(विभीषण कहते हैं—) आपके हृदय में विपरीत कुबुद्धि बस गयी है, तभी आप हित को अहित और शत्रु को मित्र मान रहे हैं। सीता तो राक्षस-कुल के लिये कालरात्रि है, फिर भी उस पर आपकी घनी प्रीति है।
[दोहा ४०]
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥
भावार्थ(दोहा 40) हे तात! मैं चरण पकड़कर माँगता हूँ, मेरा दुलार (स्नेह) रखिए — सीता जी को श्रीराम को दे दीजिए, जिससे आपका अहित न हो।
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मृत्यु अब आई॥१॥
भावार्थविभीषण ने पण्डितों, पुराणों एवं श्रुति से सम्मत वाणी से नीति बखानकर कही; पर सुनते ही रावण क्रोध से उठ खड़ा हुआ (और बोला—) रे दुष्ट! अब तेरी मृत्यु निकट आ गयी है।
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥२॥
भावार्थ(रावण कहता है—) रे मूर्ख! तू सदा मेरा दिया खाकर जीता है, फिर भी रे मूढ़! तुझे शत्रु का पक्ष भाता है। रे दुष्ट! तू यह क्यों नहीं कहता कि जगत में ऐसा कौन है जिसे मैंने भुजबल से न जीता हो?
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥३॥
भावार्थ(रावण कहता है—) मेरे नगर में बसकर तपस्वियों पर प्रीति रखता है! रे मूर्ख! जा, उन्हीं से मिल और उन्हें नीति सुना। ऐसा कहकर उसने विभीषण को लात मारी; तो भी अनुज विभीषण बार-बार उसके चरण पकड़ते रहे।
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥४॥
भावार्थ(शिवजी कहते हैं—) हे उमा! संत की यही बड़ाई है कि बुरा करनेवाले का भी वह भला ही करता है। (विभीषण बोले—) आप पिता के समान हैं, भले ही आपने मुझे मारा, पर हे नाथ! श्रीराम का भजन करने में ही आपका हित है।
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥५॥
भावार्थविभीषण मन्त्रियों को साथ लेकर आकाश-मार्ग से चले और सबको सुनाकर ऐसा कहने लगे —
[दोहा ४१]
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥
भावार्थ(दोहा 41) श्रीराम सत्यसंकल्प प्रभु हैं और हे रावण! तेरी सभा कालवश है; अतः मैं अब श्रीरघुवीर की शरण जाता हूँ — इसमें मुझे दोष न देना।
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयू हीन भए सब तबहीं॥
भावार्थऐसा कहकर विभीषण ज्यों ही चले, त्यों ही (सहायकहीन होकर) सब राक्षस आयुहीन (मृत्यु के निकट) हो गये।
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥१॥
भावार्थ(शिवजी कहते हैं—) हे भवानी! साधु का अपमान तुरन्त ही सम्पूर्ण कल्याण की हानि (नाश) कर देता है।
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥२॥
भावार्थरावण ने जिस क्षण विभीषण को त्यागा, उसी क्षण वह अभागा वैभव से हीन हो गया। विभीषण हर्षित होकर मन में अनेक मनोरथ करते हुए श्रीरघुनाथ के पास चले।
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी॥३॥
भावार्थ(विभीषण सोचते हैं—) मैं जाकर प्रभु के अरुण, कोमल, सेवकों को सुख देनेवाले चरण-कमलों के दर्शन करूँगा, जिन चरणों के स्पर्श से ऋषि-पत्नी (अहल्या) तर गयीं और जिन्होंने दण्डक वन को पवित्र किया।
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥४॥
भावार्थजिन चरणों को जानकी जी ने हृदय में धारण कर रखा है, जो कपटमृग के पीछे पृथ्वी पर दौड़े, और जो शिवजी के हृदय-सरोवर के कमल हैं — मेरा अहोभाग्य है कि आज मैं उन्हीं का दर्शन करूँगा।
[वे सोचते जाते थे—] मैं जाकर भगवान्‌के कोमल और लाल वर्णके सुन्दर चरणकमलोंके दर्शन करूँगा, जो सेवकोंको सुख देनेवाले हैं, जिन चरणोंका स्पर्श पाकर ऋषिपत्नी अहल्या तर गयीं और जो दण्डकवनको पवित्र करनेवाले हैं॥३॥
[दोहा ४२]
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥
भावार्थ(दोहा 42) जिन चरणों की पादुकाओं में भरत जी ने मन लगा रखा है, अहा! आज मैं उन्हीं चरणों को अभी जाकर इन नेत्रों से देखूँगा।
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥१॥
भावार्थइस प्रकार प्रेमपूर्वक विचार करते हुए विभीषण शीघ्र ही समुद्र के इस पार आ गये। वानरों ने विभीषण को आते देखा तो जाना कि यह कोई विशेष शत्रु-दूत है।
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥२॥
भावार्थउन्हें (वहीं) रोककर वानर सुग्रीव के पास आये और सारा समाचार उन्हें सुनाया। सुग्रीव ने कहा — हे रघुनाथ! सुनिए, रावण का भाई (विभीषण) मिलने आया है।
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥३॥
भावार्थप्रभु ने कहा — हे सखा! क्या पूछना (क्या करना) चाहिए? सुग्रीव ने कहा — हे नरनाथ! सुनिए, राक्षसों की माया जानी नहीं जाती; यह इच्छानुसार रूप धरनेवाला किस कारण आया है?
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥४॥
भावार्थ(सुग्रीव कहते हैं—) यह दुष्ट हमारा भेद लेने आया है; मुझे तो यही उचित लगता है कि इसे बाँधकर रखा जाये। (श्रीराम बोले—) हे सखा! तुमने नीति तो अच्छी विचारी, पर मेरा प्रण है शरणागत का भय हरना।
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥५॥
भावार्थप्रभु के वचन सुनकर हनुमान जी हर्षित हुए (कि) भगवान शरणागत पर वत्सल (प्रेममय) हैं।
[दोहा ४३]
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥
भावार्थ(दोहा 43) जो शरण में आये हुए को अपने अहित की आशंका से त्याग देते हैं, वे मनुष्य नीच एवं पापमय हैं; उन्हें देखने मात्र से हानि होती है।
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥१॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) जिसे करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या भी लगी हो, शरण में आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥२॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) पापी का यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी नहीं सुहाता; यदि विभीषण दुष्ट-हृदय होता तो क्या वह मेरे सम्मुख आ सकता?
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥३॥
भावार्थनिर्मल मन का मनुष्य ही मुझे पाता है; मुझे कपट, छल एवं छिद्र (दोष) नहीं भाते। भले ही रावण ने इसे भेद लेने भेजा हो, तो भी हे सुग्रीव! इसमें कोई भय या हानि नहीं।
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥४॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) हे सखा! जगत में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण क्षणभर में उन सबको मार सकते हैं; फिर भी यदि कोई भयभीत होकर शरण आये, तो मैं उसे प्राणों के समान रखता हूँ।
[दोहा ४४]
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥
भावार्थ(दोहा 44) कृपा के धाम श्रीराम हँसकर कहते हैं — चाहे मित्र हो या शत्रु, दोनों ही दशा में उसे आदरपूर्वक ले आओ। 'जय कृपालु' कहकर अंगद एवं हनुमान सहित वानर चले।
सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥१॥
भावार्थवानर विभीषण को आदरपूर्वक आगे कर वहाँ चले जहाँ करुणासागर श्रीरघुपति थे। दूर से ही उन्होंने नेत्रों को आनन्द देनेवाले दोनों भाइयों (राम-लक्ष्मण) को देखा।
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥२॥
भावार्थफिर शोभा के धाम श्रीराम को देखकर विभीषण पलक रोककर एकटक निहारते रह गये — लम्बी भुजाएँ, कमल-से अरुण नेत्र, श्यामल शरीर, शरणागत के भय को छुड़ानेवाले।
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥३॥
भावार्थसिंह के-से कंधे एवं विशाल वक्षःस्थल सुशोभित था; मुख अगणित कामदेवों के मन को मोहनेवाला था। नेत्रों में जल एवं शरीर अत्यन्त पुलकित हो उठा; मन में धीरज धरकर विभीषण कोमल वचन बोले।
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥४॥
भावार्थ(विभीषण कहते हैं—) हे नाथ! मैं दशमुख रावण का भाई हूँ; हे देवताओं के रक्षक! मेरा जन्म राक्षस-कुल में हुआ है। मेरा तामस शरीर स्वभाव से ही पाप-प्रिय है, जैसे उल्लू को अन्धकार पर स्नेह होता है।
[दोहा ४५]
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥
भावार्थ(दोहा 45) हे प्रभु! आपका सुयश कानों से सुनकर मैं आया हूँ कि आप जन्म-मरण के भय का नाश करनेवाले हैं। हे आर्तिहर, शरणागत को सुख देनेवाले श्रीरघुवीर! त्राहि-त्राहि, मेरी रक्षा कीजिए।
अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥१॥
भावार्थऐसा कहकर विभीषण को दण्डवत करते देख प्रभु विशेष हर्ष से तुरन्त उठ खड़े हुए। दीन वचन सुनकर प्रभु के मन को भाया; उन्होंने विशाल भुजाओं से पकड़कर विभीषण को हृदय से लगा लिया।
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥२॥
भावार्थअनुज लक्ष्मण सहित मिलकर विभीषण को पास बैठाकर भक्तों के भय हरनेवाले श्रीराम बोले — हे लंकेश! परिवार सहित बताओ, कुस्थान (राक्षसों के बीच) तुम्हारा निवास सकुशल तो है?
खल मंडली बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥३॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) दुष्टों की मण्डली में दिन-रात बसते हो; हे सखा! वहाँ धर्म किस प्रकार निभता है? मैं तुम्हारी सब रीति जानता हूँ — तुम अत्यन्त नीति-निपुण हो, तुम्हें अनीति नहीं भाती।
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥४॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) हे तात! नरक में निवास वरन् अच्छा, पर विधाता दुष्ट का संग न दे। (विभीषण बोले—) हे रघुनाथ! अब आपके चरण-दर्शन से कुशल हूँ, क्योंकि आपने मुझे अपना जन जानकर दया की।
[दोहा ४६]
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥
भावार्थ(दोहा 46) (श्रीराम कहते हैं—) जब तक जीव काम-शोक के धाम को त्यागकर श्रीराम का भजन नहीं करता, तब तक न उसका कुशल है और न स्वप्न में भी मन को विश्राम मिलता है।
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥१॥
भावार्थजब तक धनुष-बाण एवं कमर में तरकश धारण किये श्रीरघुनाथ हृदय में नहीं बसते, तब तक हृदय में लोभ, मोह, मत्सर, मद एवं मान — अनेक दुष्ट बसे रहते हैं।
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥२॥
भावार्थममता-रूपी घोर अन्धकारमयी रात्रि, जो राग-द्वेष रूपी उल्लुओं को सुख देती है — वह तब तक जीव के मन में बसती है, जब तक प्रभु के प्रताप रूपी सूर्य का उदय नहीं होता।
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥३॥
भावार्थ(विभीषण कहते हैं—) हे राम! आपके चरण-कमलों को देखकर अब मैं सकुशल हूँ, भारी भय मिट गये। आप जिस पर कृपालु एवं अनुकूल हैं, उसे तीनों प्रकार के भव-ताप नहीं व्यापते।
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥४॥
भावार्थ(विभीषण कहते हैं—) मैं अत्यन्त अधम स्वभाव का राक्षस हूँ, मैंने कभी शुभ आचरण नहीं किया; फिर भी जिनका रूप मुनियों के ध्यान में भी नहीं आता, उन्हीं प्रभु ने हर्षित होकर मुझे हृदय से लगा लिया।
[दोहा ४७]
अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥
भावार्थ(दोहा 47) श्रीराम की कृपा एवं सुख के पुंज — मेरा अत्यन्त अपार अहोभाग्य है कि मैंने ब्रह्मा एवं शिव द्वारा सेव्य दोनों चरण-कमलों को अपने नेत्रों से देखा।
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥१॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) हे सखा! सुनो, मैं अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे भुशुण्डि, शम्भु एवं गिरिजा भी जानते हैं — यदि कोई चराचर का द्रोही भी भयभीत होकर मेरी शरण आ जाये,
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥२॥
भावार्थऔर मद, मोह एवं नाना छल-कपट त्याग दे, तो मैं उसे तुरन्त साधु के समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर एवं सुहृद-परिवार —
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥३॥
भावार्थइन सबके ममत्व-रूपी तागों को बटोरकर, उनकी एक डोरी बटकर, जो अपने मन को मेरे चरणों में बाँध देता है; जो समदर्शी है, जिसे कोई इच्छा नहीं, और जिसके मन में हर्ष, शोक एवं भय नहीं —
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥४॥
भावार्थऐसा सज्जन मेरे हृदय में वैसे ही बसता है जैसे लोभी के हृदय में धन। हे विभीषण! तुम-जैसे संत मुझे प्रिय हैं; मैं और किसी के लिये नहीं, (केवल भक्तों के लिये) देह धारण करता हूँ।
[दोहा ४८]
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥
भावार्थ(दोहा 48) सगुण के उपासक, परहित में तत्पर, नीति एवं दृढ़ नियमवाले तथा जिनके हृदय में ब्राह्मण-चरणों में प्रेम है — वे मनुष्य मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं।
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥१॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) हे लंकेश! सुनो, ये सब गुण तुममें हैं, इसीलिये तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो। श्रीराम के वचन सुनकर वानर-समूह सब 'जय कृपा के समूह' कहने लगे।
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥२॥
भावार्थप्रभु की वाणी सुनते हुए विभीषण को कानों के अमृत-सी जानकर तृप्ति ही नहीं होती। वे बार-बार प्रभु के चरण-कमल पकड़ते हैं; हृदय में अपार प्रेम समाता नहीं।
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥३॥
भावार्थ(विभीषण कहते हैं—) हे देव! हे चराचर के स्वामी! हे शरणागत-पालक! हे अन्तर्यामी! सुनिए — पहले मेरे हृदय में कुछ (राज्य आदि की) वासना थी, पर अब वह प्रभु के चरणों की प्रीति-रूपी नदी में बह गयी।
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥४॥
भावार्थ(विभीषण कहते हैं—) हे कृपालु! अब मुझे अपनी पवित्र भक्ति दीजिए, जो सदा शिवजी के मन को भाती है। रणधीर प्रभु 'एवमस्तु' कहकर तुरन्त समुद्र का जल माँगते हैं (राज्याभिषेक हेतु)।
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥५॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) हे सखा! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं, तो भी जगत में मेरा दर्शन अमोघ (कभी निष्फल न होनेवाला) है। ऐसा कहकर श्रीराम ने उन्हें (राजतिलक) तिलक कर दिया; आकाश से अपार फूलों की वृष्टि हुई।
[दोहा ४९ (क)]
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥
भावार्थ(दोहा 49 क) रावण के क्रोध रूपी अग्नि एवं उसकी श्वास रूपी प्रचण्ड वायु में जलते हुए विभीषण को श्रीराम ने बचा लिया और अखण्ड राज्य दे दिया।
[दोहा ४९ (ख)]
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ॥
भावार्थ(दोहा 49 ख) जो सम्पत्ति शिवजी ने रावण को दस सिर चढ़ाने पर दी थी, वही सम्पदा श्रीरघुनाथ ने संकोच के साथ विभीषण को दे दी।
अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥१॥
भावार्थ(शिवजी कहते हैं—) ऐसे प्रभु को छोड़कर जो किसी और को भजते हैं, वे मनुष्य बिना पूँछ-सींग के पशु हैं। प्रभु ने विभीषण को अपना जन जानकर अपनाया — प्रभु का यह स्वभाव वानर-कुल के मन को भाया।
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥२॥
भावार्थफिर सर्वज्ञ, सबके हृदय में बसनेवाले, सर्वरूप, सबसे रहित एवं उदासीन, नीति के पालक तथा (भक्तों के) कारण मनुष्य-रूप में दैत्य-कुल के नाशक प्रभु श्रीराम वचन बोले —
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥३॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) हे वीर वानरराज सुग्रीव एवं लंकापति विभीषण! सुनो, इस गम्भीर समुद्र को किस प्रकार पार किया जाये, जो मगर, सर्प एवं मछलियों से भरा तथा सब प्रकार से अत्यन्त अगाध एवं दुस्तर है?
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥४॥
भावार्थलंकेश विभीषण ने कहा — हे रघुनाथ! सुनिए, यद्यपि आपका बाण करोड़ों समुद्रों को सोख सकता है, तो भी नीति यही कही गयी है कि जाकर समुद्र से विनय की जाये।
[दोहा ५०]
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥
भावार्थ(दोहा 50) हे प्रभु! समुद्र आपके कुल में बड़े (पूर्वज) हैं; वे विचारकर उपाय बतायेंगे, जिससे बिना परिश्रम के समस्त भालू-वानरों की सेना समुद्र पार कर जायेगी।
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई॥
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥१॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) हे सखा! तुमने अच्छा उपाय कहा; ऐसा ही करें, यदि दैव सहायक हो। यह विचार (केवल दैव पर निर्भरता) लक्ष्मण के मन को नहीं भाया; श्रीराम के वचन सुनकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ।
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥२॥
भावार्थ(लक्ष्मण कहते हैं—) हे नाथ! दैव का क्या भरोसा? मन में क्रोध कर समुद्र को सोख डालिए। दैव-दैव तो कायर मन का एक सहारा है; आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारते हैं।
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥३॥
भावार्थयह सुनकर श्रीरघुवीर हँसकर बोले — ऐसा ही करेंगे, मन में धीरज धरो। ऐसा कहकर प्रभु ने अनुज लक्ष्मण को समझाया और समुद्र के समीप गये।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥४॥
भावार्थपहले सिर नवाकर प्रणाम किया, फिर तट पर कुश बिछाकर बैठ गये। जब से विभीषण प्रभु के पास आये थे, रावण ने पीछे से गुप्तचर भेज रखे थे।
[दोहा ५१]
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥
भावार्थ(दोहा 51) कपट से वानर का रूप धरे हुए उन (गुप्तचरों) ने सब लीला देखी; शरणागत पर प्रभु का स्नेह देखकर वे हृदय में प्रभु के गुणों की सराहना करने लगे।
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥१॥
भावार्थवे प्रकट रूप से श्रीराम के स्वभाव की बड़ाई करने लगे; अत्यन्त प्रेम में अपना छिपाव भूल गये। तब वानरों ने उन्हें शत्रु के दूत जाना और सबको बाँधकर सुग्रीव के पास ले आये।
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥२॥
भावार्थसुग्रीव ने कहा — हे सब वानरो! सुनो, इन राक्षसों के अंग-भंग करके भेज दो। सुग्रीव के वचन सुनकर वानर दौड़े और सेना के चारों ओर उन्हें बाँधकर घुमाया।
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥३॥
भावार्थवानर उन्हें अनेक प्रकार से मारने लगे; वे दीन होकर पुकारते रहे, फिर भी वानरों ने न छोड़ा। (गुप्तचर बोले—) जो हमारे नाक-कान काटे, उसे कोसलाधीश श्रीराम की शपथ है।
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥४॥
भावार्थयह सुनकर लक्ष्मण जी ने सबको निकट बुलाया; दया आने पर हँसकर तुरन्त छुड़ा दिया (और कहा—) रावण को यह पत्र देना; लक्ष्मण के वचन (कहे—) हे कुलघातक! (इसे) बाँचना।
[दोहा ५२]
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥
भावार्थ(दोहा 52) मूर्ख रावण से मुख-जबानी मेरा उदार सन्देश कहना — सीता जी को देकर मिल जा, नहीं तो तेरा काल आ गया है।
तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥१॥
भावार्थतुरन्त लक्ष्मण के चरणों में मस्तक नवाकर दूत गुण-गाथा बखानते हुए चले। श्रीराम का यश कहते हुए वे लंका आये और रावण के चरणों में सिर नवाया।
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥२॥
भावार्थरावण ने हँसकर बात पूछी — रे शुक! अपनी कुशल क्यों नहीं कहता? फिर उस विभीषण का समाचार कह, जिसकी मृत्यु अत्यन्त निकट आ गयी है।
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जव कर कीट अभागी॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥३॥
भावार्थ(रावण कहता है—) मूर्ख राज्य करते हुए लंका को त्याग गया; अभागा अब जौ के घुन के समान (नष्ट) होगा। फिर भालू-वानरों की सेना का हाल कह, जो कठिन काल की प्रेरणा से चली आयी है।
जिन्ह कें जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह कें हृदयँ त्रास अति मोरी॥४॥
भावार्थ(रावण कहता है—) जिनके जीवन का रखवाला कोमल-चित्त समुद्र बन गया (जिसे पार करना कठिन है)! फिर उन तपस्वियों (राम-लक्ष्मण) की बात कह, जिनका मुझे हृदय में बड़ा भय है।
[दोहा ५३]
की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥
भावार्थ(दोहा 53) क्या उनसे तेरी भेंट हुई, या मेरा सुयश कानों से सुनकर ही लौट गये? रे! तू शत्रु-सेना का तेज एवं बल क्यों नहीं बताता — तेरा चित्त बहुत चकित है।
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥१॥
भावार्थ(शुक कहता है—) हे नाथ! जैसे आपने कृपा कर पूछा है, वैसे ही क्रोध त्यागकर मेरा कहा मानिए — जब आपका छोटा भाई (विभीषण) जाकर मिला, तब जाते ही श्रीराम ने उसे राजतिलक कर दिया।
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना॥
श्रवन नासिका काटैं लागे। राम सपथ दीन्हें हम त्यागे॥२॥
भावार्थ(शुक कहता है—) 'रावण के दूत' — यह कानों से सुनते ही वानरों ने हमें बाँधकर अनेक कष्ट दिये; वे कान-नाक काटने लगे, पर श्रीराम की शपथ देने पर उन्होंने हमें छोड़ दिया।
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥३॥
भावार्थ(शुक कहता है—) हे नाथ! आपने जो सेना का हाल पूछा — वह सौ करोड़ मुखों से भी वर्णित नहीं हो सकती; नाना रंगों के भालू-वानरों की सेना है, विकराल मुखवाली, विशाल एवं भयंकर।
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥४॥
भावार्थजिसने नगर जलाया एवं आपके पुत्र (अक्षय) को मारा, उसका बल तो सब वानरों में थोड़ा है। असंख्य नामवाले कठिन, कराल योद्धा हैं, जिनमें असंख्य हाथियों का बल एवं विशाल शरीर है।
[दोहा ५४]
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥
भावार्थ(दोहा 54) द्विविद, मयन्द, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ एवं बल के राशि जाम्बवान —
ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥१॥
भावार्थये सब वानर सुग्रीव के समान हैं; इनके समान करोड़ों को कौन गिन सकता है? श्रीराम की कृपा से इनमें अतुलनीय बल है, ये तीनों लोकों को तृण के समान गिनते हैं।
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥२॥
भावार्थ(शुक कहता है—) हे दशकण्ठ! मैंने कानों से ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरों के सेनापति हैं। हे नाथ! सेना में ऐसा कोई वानर नहीं जो आपको रण में न जीत ले।
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥३॥
भावार्थवे परम क्रोध से सब हाथ मलते हैं, पर श्रीरघुनाथ आज्ञा नहीं देते। (वे कहते हैं—) मछली-सर्प सहित समुद्र को सोख लें, नहीं तो विशाल पर्वतों से भरकर पाट दें,
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥४॥
भावार्थऔर रावण को मसलकर धूल में मिला दें — सब वानर ऐसे ही वचन कहते हैं। वे स्वभाव से ही निडर होकर गरजते-ललकारते हैं, मानो लंका को ग्रस लेना चाहते हों।
[दोहा ५५]
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥
भावार्थ(दोहा 55) सब वानर-भालू स्वभाव से ही शूरवीर हैं, और फिर उनके सिर पर प्रभु श्रीराम हैं; हे रावण! वे संग्राम में करोड़ों कालों को भी जीत सकते हैं।
राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥
सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥१॥
भावार्थ(शुक कहता है—) श्रीराम का तेज, बल एवं बुद्धि की अधिकता को सौ-सौ हजार शेष भी नहीं गा सकते; जिन्होंने नीति में निपुण होकर भी एक ही बाण से सौ समुद्रों को सोखने की सामर्थ्य रखते हुए, आपके भाई (विभीषण) से पूछा (कि समुद्र कैसे पार हो)।
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥२॥
भावार्थ(शुक कहता है—) उसके (विभीषण के) वचन सुनकर श्रीराम कृपापूर्वक मन में समुद्र से मार्ग माँगते हैं। यह वचन सुनकर रावण हँसा (और बोला—) यदि ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरों को सहायक बनाया!
सहज भीरु कर बचन दूढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥३॥
भावार्थ(रावण कहता है—) स्वभाव से डरपोक (विभीषण) के वचनों को दृढ़ मानकर श्रीराम ने समुद्र से बालहठ ठानी है। रे मूर्ख! झूठी बड़ाई क्या करता है? शत्रु के बल-बुद्धि की थाह मैंने पा ली है।
सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥४॥
भावार्थ(रावण कहता है—) जिसका मन्त्री विभीषण-सा भयभीत हो, उसकी जगत में विजय एवं विभूति कहाँ? दुष्ट के वचन सुनकर दूत (शुक) का क्रोध बढ़ा; समय विचारकर उसने (लक्ष्मण की) पत्रिका निकाली।
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥५॥
भावार्थ(शुक कहता है—) श्रीराम के अनुज लक्ष्मण ने यह पत्र दिया है; हे नाथ! इसे बँचवाकर अपनी छाती जुड़ा लीजिए। रावण ने हँसकर बायें हाथ से पत्र लिया और मन्त्री को बुलाकर मूर्ख उसे बाँचने लगा।
[दोहा ५६ (क)]
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥
भावार्थ(दोहा 56 क) (पत्र में लिखा है—) रे मूर्ख! बातों से मन को रिझाकर अपने कुल का नाश न कर; श्रीराम से विरोध कर तू विष्णु, ब्रह्मा एवं शिव की शरण जाने पर भी नहीं बचेगा।
[दोहा ५६ (ख)]
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥
भावार्थ(दोहा 56 ख) या तो मान त्यागकर अपने अनुज (विभीषण) की भाँति प्रभु के चरण-कमलों का भ्रमर बन जा, या हे दुष्ट! श्रीराम के बाण-रूपी अग्नि में कुल सहित पतंगा बन जा।
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥१॥
भावार्थ(पत्र) सुनते ही रावण का मन भयभीत हुआ, पर मुख से मुस्कुराते हुए वह सबको सुनाकर कहने लगा — भूमि पर पड़ा (तुच्छ) होकर हाथ से आकाश पकड़ना चाहता है — यह छोटे तपस्वी की वाणी का विलास (डींग) है।
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥२॥
भावार्थशुक ने कहा — हे नाथ! सारी वाणी सत्य है; अभिमानी स्वभाव छोड़कर समझिए। मेरा वचन सुनिए — क्रोध त्यागकर, हे नाथ! श्रीराम से विरोध छोड़ दीजिए।
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही॥३॥
भावार्थ(शुक कहता है—) यद्यपि श्रीरघुवीर समस्त लोकों के स्वामी हैं, तथापि उनका स्वभाव अत्यन्त कोमल है; मिलते ही प्रभु आप पर कृपा करेंगे और हृदय में एक भी अपराध नहीं रखेंगे।
जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥४॥
भावार्थ(शुक कहता है—) जानकी जी श्रीरघुनाथ को दे दीजिए — बस इतना मेरा कहा, हे प्रभु (रावण)! कीजिए। जब उसने सीता जी लौटाने को कहा, तब दुष्ट रावण ने उसे लात मार दी।
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥५॥
भावार्थचरणों में सिर नवाकर वह (शुक) वहाँ चला जहाँ कृपासागर श्रीरघुनाथ थे। प्रणाम कर अपनी कथा सुनायी और श्रीराम की कृपा से अपनी (पूर्व) गति पा ली।
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥६॥
भावार्थ(शिवजी कहते हैं—) हे भवानी! अगस्त्य ऋषि के शाप से वह ज्ञानी मुनि राक्षस हो गया था। बार-बार श्रीराम के चरणों की वन्दना कर मुनि अपने आश्रम को चला गया।
[दोहा ५७]
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥
भावार्थ(दोहा 57) तीन दिन बीत गये, पर जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्रीराम क्रोध सहित बोले — भय के बिना प्रीति नहीं होती।
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥१॥
भावार्थ(श्रीराम कहते हैं—) हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूँ। (जैसे) मूर्ख से विनय, कुटिल से प्रीति, स्वभाव से कंजूस से सुन्दर नीति की बात,
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥२॥
भावार्थममता में रत से ज्ञान की कथा, अति लोभी से वैराग्य का बखान, क्रोधी से शम (शान्ति) एवं कामी से हरि-कथा (व्यर्थ है) — जैसे ऊसर भूमि में बीज बोने से फल (नहीं मिलता)।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥३॥
भावार्थऐसा कहकर श्रीरघुपति ने धनुष चढ़ाया; यह बात लक्ष्मण के मन को भायी। प्रभु ने कराल बाण का सन्धान किया, जिससे समुद्र के भीतर ज्वाला उठ खड़ी हुई।
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥४॥
भावार्थमगर, सर्प एवं मछलियों के समूह व्याकुल हो उठे। जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना, तब सोने के थाल में नाना मणियाँ भरकर, अभिमान त्यागकर ब्राह्मण रूप में (प्रकट होकर) आया।
[दोहा ५८]
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥
भावार्थ(दोहा 58) (शिवजी कहते हैं—) हे गरुड़! सुनो — केला काटने पर ही फलता है, चाहे कोई करोड़ों यत्न से सींचे; इसी प्रकार नीच विनय से नहीं, डाँटने पर ही झुकता है।
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥१॥
भावार्थभयभीत समुद्र ने प्रभु के चरण पकड़कर कहा — हे नाथ! मेरे सब अवगुण क्षमा कीजिए। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी — इन (पंचभूतों) की करनी स्वभाव से ही जड़ है।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥२॥
भावार्थ(समुद्र कहता है—) आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिये उत्पन्न किया है, सब ग्रन्थों ने यही गाया है। जिसके लिये प्रभु की जैसी आज्ञा है, वह उसी भाँति रहने में सुख पाता है।
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥३॥
भावार्थ(समुद्र कहता है—) प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी; पर मर्यादा भी आपकी ही बनायी हुई है — ढोल, गँवार, शूद्र, पशु एवं नारी — ये सब सिखाने-सँभालने (ताड़ना) के योग्य हैं।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥४॥
भावार्थ(समुद्र कहता है—) प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायेगी — इसमें मेरी बड़ाई नहीं। श्रुति ने प्रभु की आज्ञा को अटल गाया है; जो आपको भाये, वही मैं शीघ्र करूँ।
[दोहा ५९]
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥
भावार्थ(दोहा 59) समुद्र के अत्यन्त विनम्र वचन सुनकर कृपालु श्रीराम मुस्कुराकर कहते हैं — हे तात! जिस उपाय से वानर-सेना पार उतरे, वह उपाय बताओ।
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥१॥
भावार्थ(समुद्र कहता है—) हे नाथ! नील एवं नल — दोनों वानर भाइयों ने बचपन में ऋषि का आशीर्वाद पाया है; उनके स्पर्श करते ही भारी पर्वत भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जायेंगे।
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥२॥
भावार्थ(समुद्र कहता है—) मैं भी प्रभु की प्रभुता हृदय में धारण कर, अपने बल के अनुसार सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्र पर सेतु बँधवाइए, जिससे यह सुयश तीनों लोकों में गाया जाये।
एहिं सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥३॥
भावार्थ(समुद्र कहता है—) हे नाथ! मेरे उत्तरी तट पर बसनेवाले पापी दुष्ट मनुष्यों को इस बाण से मार दीजिए। कृपालु रणधीर श्रीराम ने समुद्र के मन की पीड़ा (यह प्रार्थना) तुरन्त पूरी कर दी।
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥४॥
भावार्थश्रीराम का भारी बल एवं पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुखी हुआ; सारी लीला कहकर प्रभु को सुनायी और चरणों की वन्दना कर समुद्र चला गया।
[छन्द]
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥
भावार्थ[छन्द] समुद्र अपने भवन को चला गया; श्रीरघुपति को यह मत भाया। कलियुग के पापों को हरनेवाला यह चरित्र तुलसीदास ने अपनी बुद्धि के अनुसार गाया। हे मूर्ख मन! सुख के धाम, संशय एवं विषाद के नाशक श्रीरघुपति के गुण-समूह को समस्त आशा-भरोसा त्यागकर निरन्तर गाओ एवं सुनो।
[दोहा ६०]
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥
भावार्थ(दोहा 60) श्रीरघुनाथ का गुण-गान समस्त सुन्दर मंगलों को देनेवाला है; जो इसे आदरपूर्वक सुनते हैं, वे बिना किसी नौका के ही भवसागर पार कर जाते हैं।
मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्चमः सोपानः समाप्तः।