श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

स्वामी रामतीर्थ जी महाराज

गुरु परम्परा
क्रम: 25 / 34

स्वामी रामतीर्थ जी महाराज

गुरु वंशावली में नाम अंकित। मन्दिर के छन्द–5 एवं छन्द–6 में एक ही चरण दो बार आता है — "स्वामी रामतीरथ सन्यासी, जिन्हां कटी जमां वाली फांसी" (छन्द–5) तथा "स्वामी राम तीर्थ सन्यासी, जिनौंने कटी जमा दी फांसी" (छन्द–6)। इन्हें प्रसिद्ध वेदान्ती सन्त स्वामी रामतीर्थ जी महाराज (1873–1906) से सम्बन्धित माना जाता है — जो पंजाब के एक गणितज्ञ-प्राध्यापक से सन्यासी बने।
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उनके जीवन-प्रसंग, उनके द्वारा कहे गए दृष्टांत एवं उनके विषय में प्रचलित कथाएँ।

जीवन परिचय

स्वामी रामतीर्थ जी महाराज का जन्म 22 अक्टूबर 1873 को पंजाब के गुजरांवाला जिले के मुरलीवाला गाँव में तीर्थ राम जी महाराज के रूप में हुआ। उनका परिवार गोसाईं परम्परा से जुड़ा था और साधन सीमित थे। बाल्यावस्था में माता के निधन के बाद बड़े भाई गोस्वामी गुरुदास जी महाराज और परिवार की एक वृद्ध बुआ ने उन्हें संभाला। प्रारम्भिक अभाव ने उनके भीतर आत्मनिर्भरता, करुणा और आंतरिक शक्ति की गहरी भूमि तैयार की।

तीर्थ राम जी महाराज की प्रतिभा पढ़ाई में बहुत जल्दी दिखाई देने लगी। कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा नहीं छोड़ी। वे लाहौर पहुँचे, गणित का गंभीर अध्ययन किया और अपने समय के मेधावी विद्यार्थियों में गिने गए। भोजन, फीस और पुस्तकों की चिंता के बीच भी ज्ञान के प्रति उनका उत्साह तपस्या जैसा था।

उनके जीवन में भगत धन्नाराम का प्रभाव गहरा था। तीर्थ राम जी महाराज ने उनमें अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक देखा। गणित की तर्कशीलता और भक्ति की आंतरिक धारा उनके भीतर साथ-साथ चलती रही। धीरे-धीरे वेदान्त उनके लिए पुस्तक का विषय न रहकर जीवन का अनुभव बन गया।

शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने गणित पढ़ाया। लाहौर का जीवन बाहर से एक सफल अध्यापक और गृहस्थ का जीवन था, लेकिन भीतर गहरा परिवर्तन चल रहा था। वे विद्यार्थियों को गणित समझाते, परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते और साथ ही आत्मा, ब्रह्म तथा मनुष्य की अनन्त संभावना पर मनन करते।

उनकी वाणी में वेदान्त केवल दार्शनिक सिद्धान्त नहीं था। वे मनुष्य को भय, संकीर्ण पहचान और आत्महीनता से ऊपर उठाने की बात करते थे। उनके लिए ईश्वर दूर बैठी सत्ता नहीं, प्रत्येक मनुष्य के भीतर उपस्थित व्यापक आत्मा था। उनका व्यावहारिक वेदान्त जीवन से भागने के बजाय काम, साहस, प्रेम और आत्मविश्वास को आध्यात्मिकता से जोड़ता था।

लगभग सदी के मोड़ पर तीर्थ राम जी महाराज ने हिमालय की ओर कदम बढ़ाया और संन्यास ग्रहण कर रामतीर्थ जी महाराज बने। यह परिवर्तन वर्षों की साधना, वैराग्य और आत्मानुभूति की खोज का परिणाम था। हिमालय के मौन में गणितज्ञ की सूक्ष्म दृष्टि और वेदान्ती साधक का अनुभव एक-दूसरे में घुल गए।

1902 में उनकी यात्रा भारत से बाहर आरम्भ हुई। जापान और फिर संयुक्त राज्य अमेरिका में उन्होंने वेदान्त पर व्याख्यान दिए। विदेशी श्रोताओं के सामने उन्होंने भारत को आत्मविश्वास से प्रस्तुत किया। वे सार्वभौमिक एकता, मनुष्य की दिव्यता और निर्भय जीवन की बात करते थे। उनकी भाषा में काव्य, विनोद, गणितीय स्पष्टता और संन्यासी का उन्मुक्त उत्साह साथ दिखाई देता था।

अमेरिका में उनका प्रभाव औपचारिक सभाओं तक सीमित नहीं रहा। वे लोगों से व्यक्तिगत रूप से मिलते, प्रश्नों का उत्तर देते और पूर्व तथा पश्चिम को विरोधी खेमों की तरह देखने से बचते। उनका संदेश था कि आत्मा किसी जाति, राष्ट्र या धर्म की सीमा में बंद नहीं होती।

भारत लौटने पर वे राष्ट्रीय जागरण के समय में बोले। उनका देशप्रेम आत्म-अहंकार नहीं, आत्म-जागरण पर आधारित था। वे चाहते थे कि भारत अपने आध्यात्मिक आत्मविश्वास को पहचाने और आधुनिक संसार के सामने निर्भय होकर खड़ा हो। उनके लिए देशप्रेम और विश्व-मानवता एक-दूसरे के विरोधी नहीं थे।

रामतीर्थ जी महाराज का पारिवारिक जीवन सरल नहीं था। संन्यास का मार्ग पत्नी, बच्चों और निकट संबंधियों के लिए पीड़ा और प्रश्न भी लाया। उनके जीवन का यह मानवीय पक्ष बताता है कि आध्यात्मिक निर्णय कभी-कभी परिवार के लिए कठिन परिवर्तन भी लेकर आते हैं।

17 अक्टूबर 1906 को टिहरी के निकट गंगा में उनका जीवन समाप्त हुआ। वे केवल तैंतीस वर्ष के थे। इतनी छोटी आयु में उन्होंने गणितज्ञ, अध्यापक, कवि-स्वभाव वक्ता, संन्यासी और विश्व-वेदान्त दूत के अनेक रूप जिए। उनकी वाणी और जीवन ने बाद की पीढ़ियों में आत्मविश्वास, एकता और आत्मबोध की प्रेरणा जगाई।

गुरु परम्परा में रामतीर्थ जी महाराज के चारों ओर परिवार, शिष्य, सहचर और सहायक दिखाई देते हैं। गुरुदास जी महाराज ने उनके बचपन को संभाला, गोस्वामी भगवान दास जी महाराज ने कठिन समय में सहायता की और गोस्वामी बृजलाल जी महाराज ने निकट रहकर उनकी स्मृतियों को सुरक्षित किया। इस प्रकार रामतीर्थ जी महाराज की कथा अकेले संत की नहीं, संबंधों से बने एक व्यापक आध्यात्मिक परिवार की कथा भी है।