श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

गोस्वामी तोताराम जी महाराज

गुरु परम्परा
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विभाजन-पूर्व स्वतन्त्रता से 20 वर्ष पूर्व ही हरिद्वार आकर जप-तप में लीन हो गये थे। बाद में सेवक समाज के बार-बार आग्रह पर हरिद्वार से रामायण मन्दिर की गुरु गद्दी को पुनः संभाला।

जीवन परिचय

गोस्वामी तोताराम जी महाराज गोस्वामी दशबन्दी राम जी महाराज के पुत्र थे और हरिद्वार में एक सम्मानित संत के रूप में रहते थे। विभाजन के बाद बरेली पहुँचे मर्दान के सेवक समाज ने अपना मंदिर तो बना लिया था, लेकिन समुदाय को ऐसे आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता थी जो पुरानी परम्परा को जीवित रूप दे सके। उनकी दृष्टि तोताराम जी महाराज पर गई।

समुदाय के प्रतिनिधि हरिद्वार पहुँचे और उनसे बरेली की गुरु गद्दी स्वीकार करने का निवेदन किया। उन्हें मनाने के लिए लोगों को बार-बार जाना पड़ा। यह आग्रह बताता है कि समुदाय उन्हें कितने सम्मान और विश्वास से देखता था।

अंततः तोताराम जी महाराज ने निवेदन स्वीकार किया और बरेली की गुरु गद्दी संभाली। उनका कार्य मंदिर के संस्थापक गोस्वामी रामेश्वर दास जी महाराज की भूमिका से अलग था। रामेश्वर दास जी महाराज ने भवन और धार्मिक केंद्र खड़ा किया; तोताराम जी महाराज ने उसमें गुरु परम्परा की जीवित आध्यात्मिक उपस्थिति स्थापित की।

तोताराम जी महाराज और रामेश्वर दास जी महाराज चचेरे भाई थे। उनके पिता दशबन्दी राम जी महाराज और गोस्वामी मूलराज जी महाराज एक ही परिवार की दो शाखाओं से थे। इस प्रकार बरेली में मंदिर निर्माण और गुरु गद्दी का मिलन बिखरे हुए परिवार तथा समुदाय की शाखाओं के फिर से जुड़ने की कथा भी बन गया।

विस्थापन के बाद गुरु की भूमिका केवल पूजा और उपदेश तक सीमित नहीं थी। लोगों को साझा स्मृति, अनुशासन, आश्वासन और एक-दूसरे से जुड़ने की जगह चाहिए थी। तोताराम जी महाराज ने नए शहर में इस आध्यात्मिक केंद्र को स्थिरता दी।

उनके महाप्रयाण के बाद गोस्वामी देवेंद्र जी महाराज ने गुरु गद्दी संभाली। तोताराम जी महाराज आधुनिक उत्तराधिकार की निर्णायक कड़ी बने—हरिद्वार के संत, बरेली में आमंत्रित गुरु और विस्थापित समुदाय की आध्यात्मिक धुरी।